टर्की भाभी की चुत की प्यास भुजाइ

जब मैं रोज़ थका हारा जब काम पर से घर आता हूँ तो खाना खाने के बाद रात को बस अन्तर्वासना ही एक मात्र ज़रिया होता है मनोरंजन का। अन्तर्वासना पर रोज़ नई कहानी पढ़ कर मैं सोचता था कि क्या सच में ऐसा हो सकता है।

लेकिन फिर एक दिन जब मेरी किस्मत बदली तो समझ में आया कि जब लंड की किस्मत में चूत लिखी है तो वो मिल कर ही रहेगी।
हुआ यूँ कि मैं जिस सेक्टर में रहता हूँ वहाँ हमारी बिल्डिंग में मेरे कमरे के नीचे एक परिवार किराए पर रहता है। हमारे मकानमालिक मोहाली में रहते हैं और हर महीने की पांच तरीक को किराया लेने आते हैं।

नीचे रह रहे परिवार में कुल मिलाकर पांच लोग रहते हैं। संजीव भाई, उनकी पत्नी इला भाभी (काल्पनिक नाम), दो बच्चे ईशान और रूचि और भाभी की सास।

मैं रोज़ सुबह 8 बजे काम के लिए निकल जाता हूँ और शाम को 7 बजे रूम पर पहुँचता हूँ। सुबह जाने से पहले नीचे भाभी रोज़ झाड़ू मारते हुए दिख जाती थी। जब वो झाड़ू मारती थीं तो उनके खुले गले वाले कमीज में से उनके दो बड़े बड़े ताजमहल देख कर मेरा कुतुबमीनार छलांगें मारने लगता था। लेकिन मैं कर क्या सकता था उनको देखने के सिवा।

फिर एक रात को मैंने अन्तर्वासना पर एक पड़ोसी भाभी की चुदाई वाली कहानी पढ़ी। कहानी पढ़ते ही मैंने तय कर लिया कि अब जो भी हो जाए इला भाभी की चूत मारनी है तो मारनी है।
फिर मैंने धीरे धीरे भाभी से जान पहचान ज्यादा बढ़ानी शुरू कर दी। बात तो वो पहले से ही करती थी मुझसे … लेकिन टाइम की कमी के कारण ज्यादा बात नहीं हो पाती थी।
पर अब मैं बस हर टाइम इसी तलाश में रहता की कैसे मैं उनसे बात करूं।

धीरे धीरे हमारी बातें बढ़ती गई; फ़ोन नंबर एक्सचेंज हुए; व्हाट्सप्प पर बातों का सिलसिला शुरू हुआ। फिर बातें धीरे धीरे मेरी गर्लफ्रेंड तक आ गई और मैंने मना कर दिया कि मेरी कोई गर्लफ्रेंड नहीं है।
फिर कुछ दिनों तक कोई बात नहीं हुई भाभी से।

एक दिन शुक्रवार को मैं सुबह काम के लिए जा रहा था तो देखा भाभी का पूरा परिवार बाहर खड़ा था और गाड़ी में बैठ कर कहीं जाने की तैयारी लग रही थी।
मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया और काम पर चला गया।

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शाम को जब रूम आया तो सोचा अब हर हफ्ते की तरह दो दिन हैं मेरे पास आराम करूंगा क्यूंकि शनिवार और रविवार की छुट्टी होती है मुझे।

फिर मैं सब्जी लेने बाहर जा रहा था तो भाभी भी कहीं बाहर जा रही थी। मैं ऊपर ही रुक गया लेकिन भाभी ने मुझे आते देख लिए तो कहा- क्या हुआ? रुक क्यों गए? कहाँ जा रहे हो?
मैंने कहा- सब्जी लेने जा रहा था मार्किट तक!
भाभी- अरे वाह, मैं भी सब्जी लेने ही जा रही हूँ, चलो साथ में चलते हैं।

मैं- आप लोग तो सुबह कहीं जा रहे थे।
भाभी- हाँ, वो बच्चों को हफ्ते की छुट्टी है तो संजीव बच्चों को और सासु माँ को दिल्ली लेकर गए हैं 15 अगस्त दिखाने।
मैं- आप नहीं गई?
भाभी- नहीं, मेरे मम्मी-पापा आ रहे हैं चार पांच दिन में तो मैं यहीं रुक गई।
मेरे मुंह से एकदम निकल गया ‘अरे वाह!’
भाभी- क्या मतलब वाह का?
मैं- कुछ नहीं बस ऐसे ही!

भाभी- अच्छा आज तुम मेरे साथ मेरे घर पर ही खाना खा लेना, मैं भी अकेली ही हूँ, मुझ भी कंपनी मिल जाएगी और तुम्हें घर का खाना मिल जाएगा खाने को।
मैं मन ही मन बहुत खुश था पर ऊपरी दिखावे के लिए मैंने कहा- अरे आप क्यों तकलीफ कर रहे हो? मैं खा लूंगा अपने कमरे में बना के।
भाभी- ये मैं पूछ नहीं रही, आर्डर दे रही हूँ।
मैं- ठीक है मैं आ जाऊंगा।

रात को 9 बजे मुझे भाभी का फ़ोन आया- आ जाओ खाना तैयार है।
मैं ख़ुशी ख़ुशी चला गया और ये सोच लिया था कि आज तो चूत मार कर ही वापिस आना है।
हमने खाना खाया और मैंने भाभी की मदद करी बर्तन धोने के बाद रखने में।

भाभी- आज काम जल्दी हो गया। थैंक्स मदद करने के लिए।
मैं- अरे इसमें क्या है ये तो करना ही चाहिए अकेली लड़की क्या क्या काम करेगी घर का। मैं तो घर में भी मदद कर देता हूँ मम्मी की।

फिर हम बाहर आए और सोफे पर बैठ कर बातें करने लगे।
मैंने बड़ी हिम्मत कर के पूछा- आपका तो आज दिल नहीं लगेगा भैया के बिना … रात अधूरी रह जाएगी।
मेरी बात सुन कर भाभी की आँखें नम हो गई।

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मैं उनके पास गया और उनसे पूछा- क्या हुआ? सॉरी अगर मैंने कुछ गलत कहा तो।
भाभी- नहीं, तुम्हारी कोई गलती नहीं है, संजीव अब मुझे वो सुख नहीं दे पाते।

मैं उनको चुप कराने लग गया और वो मेरे कंधे पर सर रख कर बैठ गई। मैंने मौके का फायदा उठाया और उनकी पीठ को सहलाने लगा।
वो चुप हो गई और फिर बोलने लगी- तुमको कैसी लड़की चाहिए?
मैं- भाभी बुरा ना मानना मुझे बिल्कुल आप जैसी लड़की चाहिए!
भाभी- चल हट झूठा, मेरे जैसी क्यों, मेरे में क्या है ऐसा?

मैं- भाभी आप बहुत खूबसूरत हो, आपकी बात ही कुछ और है!
भाभी- अच्छा ऐसा क्या खूबसूरत है मुझमें, दो बच्चों की मां हो गई हूँ अब तो!
मैं- देखने से तो अभी आप 28 की लगती हो!
भाभी- अच्छा तो क्या है ऐसा मुझमें?
मैं- बुरा तो नहीं मानोगी?
भाभी- नहीं … बोलो?

मैं- भाभी आप सर से ले कर पाँव तक क़यामत हो। आपके बाल इतने घने हैं, आपकी आँखें कितनी प्यारी हैं, आपकी मुस्कान उफ़ कातिलाना है!
भाभी- बस बस … ये फ़िल्मी डायलाग न मार!
मैं- तो सच सुनो भाभी!
भाभी- सुना?

मैं- भाभी, मुझे आपके होंठ बहुत पसंद हैं.
यह बोलते ही मैंने उनका चेहरा अपने हाथों में ले लिया.
मैं- और आपकी छाती पे ये दो बड़े बड़े कलश ये मेरा मन मोह लेते हैं और इनसे मेरी नज़र नहीं हटती। आपकी ये कमर और आपके चूतड़ ये आपके चलने से जो कहर ढाते हैं आप नहीं जानती कि आप कितने लोगों को घायल करती हो।
मेरा इतना कहना था कि भाभी ने मुझे गले से लगा लिया।
मैं मन ही मन बहुत खुश था और भाभी की पीठ सहला रहा था।

हिम्मत करके मैंने उनकी गरदन को चूमना शुरू कर दिया। वो गर्म साँसें लेने लगी और उम्मम्मम उफ्फ्फ जैसी आवाज़ें करने लगी।
उन्होंने कहा- अंदर कमरे में चलो, मैं घर के दरवाज़े लगा कर आती हूँ।

जब वो अंदर आई तो मुझे चूमने लगी, मैंने भी उनके होंठों को चूमना शुरू कर दिया. पांच मिनट के चुम्बन के बाद मैंने भाभी को बिस्तर पर लिटा दिया और एक एक करके उनके और अपने सारे कपड़े उतार दिए।
कपड़े उतारते ही उन्होंने लाइट बंद कर दी।
मैंने कहा- लाइट क्यों बंद करी?
तो बोलती- मुझे शर्म आती है।

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