सुहाना सफर और हसीन चुदाई 1

दोस्तो, मेरी पिछली कहानी में आपने मेरी और किशोर की चुदाई के बारे में पढ़ा. लेकिन उसके बाद से मैं किशोर से नहीं मिली. लेकिन हाँ … मैं आज भी सुखविन्दर से मिलती हूँ. इसके साथ साथ मैंने और भी कई लोगों से जिस्मानी रिश्ता बनाया।
उनमें से ही एक कहानी आज आप लोगों के बीच लाई हूँ।
तो चलते हैं कहानी की तरफ।

ये कहानी तब की है जब मेरी बेटी का जन्म नहीं हुआ था.
अचानक एक दिन मेरी माँ का फ़ोन आया और उन्होंने एक शादी में शामिल होने के लिए मुझे कुछ दिनों के लिए मायके बुलाया।

शाम को जब पति आये तो मैंने उन्हें ये बात बताई. उन्होंने तो जाने से मना कर दिया क्योंकि उनको काम से छुट्टी मिलना मुश्किल था। तो तय ये हुआ कि वो मेरा ट्रेन में सीट बुक करवा दिया और मुझे अकेले जाने की इजाजत दे दी।

मेरा घर यहाँ से 700 किलोमीटर दूर है और इटारसी से मुझे ट्रेन भी बदलनी होगी।
पर मैंने हाँ कह दिया।

7 दिसंबर को मुझे जाना था, मैंने सभी तैयारी कर ली और मेरे पति ने मुझे रेलवे स्टेशन जाकर मुझे ट्रेन में बैठा दिया.

दिन भर के सफर के बाद मुझे शाम 7 बजे अपने स्टेशन पर पहुँचना था, मुझे भी कोई परेशानी नहीं महसूस हो रही थी। पता नहीं क्यों मगर ट्रेन में ज्यादा भीड़ नहीं थी. मेरे सामने वाली सीट पर एक परिवार था. मगर कुछ ही देर में उनका स्टेशन आ गया और वो लोग उतर गए।

उसके बाद वहां पे एक आदमी आया. उसने मेरी तरफ देखा और अपनी सीट का नंबर देख कर बैठ गया।
कुछ देर बाद उसने मुझसे पूछा- क्या आप अकेली हैं?
मैंने कहा- हां।

इस तरह बात करते करते मुझे पता चला कि वो भी इटारसी से अपनी ट्रेन बदलने वाले थे।
इस तरह हम दोनों ही बात करते करते काफी घुलमिल गए। दोनों ने अपने परिवार के बारे में एक दूसरे को बताया और सफर ऐसे ही चलता रहा।
इस बीच कई लोग उस डिब्बे में आते रहे और जाते रहे। मगर हम दोनों बस अपनी बातों में लगे रहे।

हम लोगों की ट्रेन इस बीच 3 घंटे देर हो चुकी थी। मुझे डर था कि क्या मुझे मेरी वो ट्रेन मिल पायेगी जिसे मुझे इटारसी से पकड़नी थी और और बिल्कुल वही डर उनके मन में भी था।
उनका नाम हेमन्त कुमार था. वो सेना से रिटायर थे और अब अपना खुद का एक बिजनेस चलाते थे इसलिए वो यहाँ आये थे।

बातों ही बातों में उन्होंने मुझसे पूछा- अगर आपकी ट्रेन नहीं मिल पाई तो क्या करेंगी आप?
मैंने कहा- मेरी एक सहेली रहती है इटारसी में … उसके यहाँ चली जाऊँगी।

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शाम के 5 बज चुके थे मगर इटारसी अभी बहुत दूर ही था. हमारी ट्रेन 4 घंटे से भी ज्यादा लेट हो चुकी थी. अब तो मुझे पक्का लग रहा था कि मुझे ट्रेन नहीं मिलने वाली।
मैंने अपने पति को फ़ोन किया और यह बात बताई और मैंने कहा- अगर ट्रेन नहीं मिलती है तो मैं अपनी सहेली के यहाँ चली जाऊँगी.
उन्होंने भी मुझे यही करने के लिए कहा।
कुछ देर बात करने के बाद मैंने फ़ोन काट दिया।

शाम हो गई थी और ठण्ड भी बहुत ज्यादा लग रही थी मेरे पास एक स्वेटर के अलावा और कोई गर्म कपड़े नहीं थे. हेमन्त को अहसास हो गया कि मुझे ठण्ड लग रही है।

उस वक्त उन्होंने एक कम्बल ओढ़ रखा था। उन्होंने बोला- अगर आप बुरा न मानें तो आप मेरे साथ कम्बल का इस्तेमाल कर सकती हैं।
पता नहीं वो यह बात किस उद्देश्य से बोले थे मगर ठण्ड इतनी ज्यादा लग रही थी कि मैं उनके साथ उनके कम्बल में चली गयी।

कुछ देर तो सब ठीक था मगर कुछ देर में मझे नींद आनी शुरू हो गई और मैं उनके कंधे पर सर रख कर सो गई। मुझे लग ही नहीं रहा था कि मैं किसी गैर मर्द के साथ हूँ।
सोते हुए मैं बार बार इधर उधर हो जा रही थी तो उन्होंने अपना एक हाथ मेरी पीठ से ले जा कर मेरी बांह को पकड़ ली जिससे मैं अच्छे से सो पा रही थी।

कुछ देर के बाद मुझे महसूस हुआ कि उनकी उंगलियाँ मेरी बांह को सहला रही थी।
मैंने कुछ नहीं कहा और चुपचाप वैसी ही लेटी रही क्योंकि मुझे उनका ऐसा करना अच्छा लग रहा था, सच कहूँ तो मेरी वासना जाग गई थी। मैं उनसे थोड़ा और सट गई और सोने का नाटक करती रही।

ट्रेन के हिलने के कारण या कुछ और मगर उनका हाथ अचानक से मेरे बांह से हट कर मेरे उभार पर चला गया। मगर उन्होंने हाथ नहीं हटाया। मैं फिर भी वैसी ही सोने का नाटक करती रही।
और वो हाथ को मेरे उभारों में चलाने लगे मानो मेरी गोलाइयों को नाप रहे हों।

मेरी साँसें तेजी से चल रही थी और मेरी गर्म सांस उनके गाल में लग रही थी। शायद उनको अहसास हो चुका था कि मैं जाग रही हूँ और कोई विरोध नहीं कर रही।
तभी तो उन्होंने मेरे ब्लाउज का एक हुक खोल लिया और अपनी दो उंगलियाँ मेरे दूध के बीच की लकीर में डाल दी.

मेरे गर्म जिस्म का स्पर्श पाकर और मेरी तरफ से कोई विरोध न पाकर ब्लाऊज का दूसरा हुक खोलने का प्रयास करने लगे।
मगर अब मैंने उनका हाथ पकड़ कर उन्हें रोक दिया और बोली- प्लीज ऐसा मत कीजिये।

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अब तो उन्हें पूरा पता चल गया कि मैं जाग रही हूँ। उन्होंने मेरा हाथ अपने हाथों में लिया और सहलाने लगे। मैं वैसे ही चुपचाप आँख मूँद कर उनके कंधे पर सर रखी थी।
उन्होंने हाथ सहलाते हुए मेरा हाथ अपने लंड पर रख दिया। उनका लंड पूरा टाइट हो गया था। मैं पैन्ट के ऊपर से ही उनका लंड सहलाने लगी। उनका लंड बिल्कुल सुखविन्दर जितना ही लग रहा था।

उन्होंने अपने हाथ से पैन्ट की चेन खोल दी और अपनी चड्डी को नीचे कर के अपना लंड बाहर निकाल दिया. उनके गर्म गर्म लंड का स्पर्श पाकर मेरी तो चड्डी गीली होने लगी। काफी देर तक मैं उनका लंड सहलाती रही।

तभी अचानक से शहर की रोशनी मेरे चेहरे पर पड़ी तो मैंने तुरंत पूछा- कौन सा स्टेशन है?
तो उन्होंने कहा- इटारसी आ रहा है।
मैं तुरंत उठकर अपने आपको ठीक किया. उन्होंने भी अपने आप को ठीक किया और कुछ ही देर में हम लोग इटारसी में उतर गए।

रात के 8:30 बज रहे थे, उन्होंने तुरंत ही जाकर हम दोनों की ट्रेन पता की और वापस लौट कर बोले- इसे अच्छी खबर बोलूं या बुरी?
मैंने कहा- क्या मतलब?
“मतलब ये कि तुम्हारी ट्रेन निकल गई है और मेरी अभी लेट है।”
मैंने कहा- अरे यार … अब क्या होगा?
उन्होंने कहा- तुम्हारी अगली ट्रेन कल सुबह 11 बजे की है।
मैंने कहा- कोई बात नहीं, मैं सहेली दोस्त के यहाँ चली जाती हूँ।

वो बहुत उदास हो कर बोले- अगर तुम चाहो तो मेरे पास दूसरा प्लान भी है।
मैंने कहा- क्या प्लान?
वो बोले- अगर बुरा न मानो तो हम दोनों रात किसी होटल में बिता सकते हैं. मैं कल सुबह चला जाऊँगा।

मैं मुस्कुराते हुए बोली- अगर किसी को पता चल गया तो?
वो भी मुस्कान के साथ बोले- यहाँ कौन हैं जो हम दोनों को पहचानता है। बोलो क्या हम दोनों कुछ पल साथ बिता सकते हैं?
मैंने कुछ नहीं कहा, बल्कि अपना फ़ोन निकाल कर अपने पति को फोन किया और बोली- मेरी ट्रेन छूट गई है. अब मैं अपनी दोस्त के यहाँ आ गई हूँ, आप बिल्कुल चिंता मत कीजिये।
और फ़ोन काट दिया।

इतने में वो मेरी भावना को समझ गए और मेरा बैग लेकर चल दिये. हम दोनों स्टेशन से दोनों बाहर निकल आये और एक ऑटो कर ली. उसने हम दोनों को एक बेहतरीन होटल में छोड़ दिया।

वहां होटल में उन्होंने अपना नाम बताया और मुझे अपनी पत्नी बताया और हम दोनों को एक रूम मिल गया।

दोस्तो, इसके आगे की कहानी आप अगले भाग में जरूर पढ़ें.

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