माँ और मेरी चुदाई की पापा के दोस्तों ने

यह कह कर उन्होंने अपना पूर मुँह खोला और मेरी छोटी सी प्यारी चूत को पूरा अपने मुँह में ले लिया जैसे खा ही जाएँगे।

उसके बाद उन्होने अपनी पूरी जीभ मेरी चूत की लकीर पर फेरी और अपनी जीभ मेरी चूत के अंदर तक डाल कर चाटने लगे।

मैं तो जैसे तड़प उठी, मैंने साइड पे देखा, पापा दारू पी के धुत्त हुये पड़े थे, उन्हें कोई होश नहीं था कि साथ वाले कमरे में उनकी बीवी चुद रही है और उनके बिल्कुल साथ उनकी बेटी भी अपना कौमार्य लुटवाने वाली है।

मेरी छोटी प्यारी चूत चाटते चाटते शर्माजी ने मेरे शर्ट के बटन खोले और एक एक करके मेरे सारे कपड़े उतार दिये।

मैंने अपनी टाँगों को उनके सर के अगल बगल लपेटा हुआ था, मेरी आँखें बंद थी और मैं अपनी प्यारी चूत चटवाने का भरपूर आनन्द ले रही थी।

तभी शर्माजी उठे और उन्होने अपने भी सारी कपड़े उतार दिये और लण्ड मेरी तरफ करके बोले- चूसेगी इसे?

मैंने ना में सर हिलाया।

तो उन्होने कहा- कोई बात नहीं, ऊपर वाले होंठों से नहीं तो नीचे वाले होंठो में ले ले!

यह कह कर उन्होंने मुझे सीधा किया और अपना लण्ड मेरी प्यारी चूत पे सेट किया।

मैं आने वाले खतरे से बेखबर अपनी टाँगें उठा कर उनके नीचे लेटी थी।

शर्माजी ने अपने लण्ड पे ढेर सारा थूक लगाया, और मेरी चूत पर दोबारा सेट करके मुझे बड़ी अच्छी तरह से अपनी आगोश में जकड़ लिया।

मेरे होंठों को अपने होंठों में ले लिया और फिर अपना लण्ड मेरी प्यारी चूत में घुसेड़ने लगे।

जिस काम को मैं मज़े का समझ रही थी वो तो बहुत दर्दनाक निकला, मुझे लगा जैसे कोई मेरे जिस्म को बीच में से चीर रहा हो, या एक गरम लोहे के सलाख मेरे जिस्म से आर पार निकल रही हो।

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मैं तो दर्द से तड़प उठी, मैं छटपटाना चाहती थी पर शर्मा अंकल ने मुझे बड़ी मजबूती से जकड़ रखा था।

मेरे तड़पने पर उन्होने और ज़ोर लगाना शुरू कर दिया और मेरी कुँवारी प्यारी चूत को बीच में से चीरते हुये उन्होने अपना आधे से ज़्यादा लण्ड मेरे बदन में घुसेड़ दिया।

अब दर्द मेरी बर्दाश्त से बाहर था और मैं चीख पड़ी।

मेरी चीख सुनते ही माँ दूसरे कमरे से भागी भागी आई, माँ जल्दबाज़ी में वो जैसे थी वैसे ही आ गई, यानि कि बिल्कुल नंगी अवस्था में !
पीछे पीछे गुप्ता अंकल भी आ गए वो भी बिल्कुल नंगे।

मगर जब तक माँ आती और सब समझती, शर्मा अंकल ने अपना पूरा लण्ड मेरे अंदर प्रविष्ट करवा दिया था।

माँ ने एकदम से शर्मा अंकल को खींच के पीछे फेंका, मगर तब तक तो चूत के उदघाटण की सारी कार्यवाही हो चुकी थी, मेरी चूत खून से लथपथ थी, शर्मा अंकल के लौड़े पर भी खून लगा था।

माँ ने शर्मा अंकल को बहुत भला बुरा कहा, मगर अब क्या हो सकता था।

शर्मा अंकल और गुप्ता अंकल दोनों ने अपने कपड़े पहने और चले गए।

मैं और माँ दोनों नंगी हालत में ही एक दूसरे से लिपट के कितनी देर रोती रहीं।

मैं दर्द की वजह से और माँ पता नहीं क्यों।

दो तीन दिन कोई हमारे घर नहीं आया, उसके बाद एक दिन गुप्ता अंकल आए और हम सब के लिए खूब तोहफे और ना जाने क्या क्या लाये।

उसके बाद फिर वही दारू का दौर शुरू हो गया।

जब पापा फिर पी कर लुढ़क गए तो गुप्ता अंकल ने माँ के सामने खुल्लम खुल्ला कहा- देख कविता, तू तो चल है ही हमारी, पर जो शर्मा ने कर दिया, उसको तो ठीक किया नहीं जा सकता, पर अगर तू चाहे तो हम तेरा घर मोतियों से भर देंगे, मगर एक शर्त है।

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चाहे माँ उनकी बात का मतलब समझ गई थी, पर ‘क्या शर्त है?’ माँ ने पूछा।

‘अब तेरे साथ साथ अंकिता को भी अपने ग्रुप में शामिल कर लेते हैं, वो भी अब जवान हो चुकी है, उसको भी ज़िंदगी जीने का हक़ है।’

उस दिन पहली बार माँ ने मुझे अपने कमरे में बुलाया और तब गुप्ता अंकल में मुझे अपनी गोद में बिठाया और बहुत प्यार किया।

मगर अब मैं भी समझती थी के इस प्यार का मतलब क्या है।

आधे घंटे बाद मैं, माँ और गुप्ता जी तीनों बिल्कुल नंगे एक दूसरे को चूम चाट रहे थे।

थोड़ी देर बाद गुप्ताजी ने फोन करके शर्माजी को भी बुला लिया ताकि जो काम उस दिन अधूरा रह गया था वो पूरा हो सके।

आज इस बात को 5 साल हो गए हैं, पापा की शराब पीने की बुरी आदत की वजह से मैं और माँ दोनों इस गंदे काम में उतरी और अब प्रोफेशनली इस काम को कर रही हैं।

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