पडोसी शादीशुदा नीतू से चुदाई जब बीवी बहार

मैंने कहा- इसका नंबर पढ़ो ! इसके पहले और बाद के नंबर के नोट मेरे पास हैं।
मैंने उसे बाकी के चार नोट दिखा दिए तो उसका चेहरा फक से रह गया, बोली- मुझे माफ़ कर दो !मैंने कहा- तुम झूठ क्यूँ बोल रही थी?
बोली- मुझे रूपये की जरुरत थी।
मैंने कहा- मुझसे बोलना था, 500 क्या 10000 दे देता !
तुरंत बेशर्मों की तरह बोली- सच?
मैंने भी कह दिया- हाँ !
और एक और नोट उसके हाथ में थमा दिया।
फिर मैंने हिम्मत करके कहा- इसके बदले में मुझे क्या मिलेगा?
बोली- तुम्हें क्या चाहिए?
मैंने भी आंख मारते हुए कह दिया- तुम !
बोली- क्या मतलब?
मैंने कहा- कभी-कभी जरुरत पर मैं तुम्हारा काम चला दिया करूँगा, तुम मेरा चला दिया करो ! मैं तुम्हें रूपये की जरुरत पूरी कर दिया करूँगा, तुम मेरी बीवी की कमी को पूरा कर दिया करो !
नीतू का चेहरा मुरझा गया, बोली- मैं ऐसी औरत नहीं हूँ, किसी को पता चल गया तो दो परिवार ख़राब हो जायेंगे।
वो रूपये लौटाने लगी।
मैंने कहा- अभी रख लो, सोच कर जबाब देना, यदि मंजूर न हो तो रूपये लौटा देना और इस बात को
यहीं ख़त्म कर देना, न मैं किसी से कुछ कहूँगा न तुम किसी से कुछ कहना।
और मैं अपने कमरे में आ गया।
मैं समझ गया कि तीर निशाने पर लग चुका है, अब जो करना है वही करेगी।
कमरे में आकर देखा साढ़े आट बज गए हैं, उस दिन मुझे ठेकेदारी की साईट पर भी कोई काम नहीं था क्यूंकि मिस्त्री और मज़दूर सभी छुट्टी पर थे। मैं अन्दर वाले कमरे मैं टीवी ऑन करके समाचार देखने लगा।
तभी बगल के कमरे का दरवाजा खुलने की आवाज़ आई, शायद नीतू बाहर निकली होगी। सोचकर समाचार पर अपना ध्यान लगाये रहा।
मुझे अपने कमरे में किसी के आने का अहसास हुआ। दीवार परछाई देखकर पर मैं टी वी की तरफ ही देखता रहा। दो मिनट बाद फिर किसी के बाहर जाने का अहसास हो गया।
मैंने अंदाज लगाया कि नीतू ही होगी, कुछ कहने आई होगी, फिर हिम्मत नहीं हुई तो वापस चली गई होगी यह सोचकर कि रोनी ने देखा नहीं।
लेकिन मैं जानता था कि अगर वो कुछ कहने आई थी तो दोबारा जरूर आएगी और कहेगी भी जरूर जो कहना चाहती है।
यह सोचकर कि बस अब दिल्ली ज्यादा दूर नहीं है, मेरे लण्ड खड़ा हो गया था आँखों में सुरूर सा महसूस हो रहा था, सारा बदन तपने लगा था पर मजबूर था क्यूंकि अब सारा दारोमदार नीतू के हाथों में था, उसकी ओर से इशारा मिलने दी देर थी।
दस मिनट बाद जब मेरी बैचेनी बढ़ने लगी तो उठा अपने कमरे से बाहर आया। नीतू बाहर छत पर कुर्सी डालकर बैठी कुछ सोच रही थी, मुझे देखकर कुछ झेंप गई।
मैं तौलिया लेकर बाथरूम में घुस गया दरवाजे की झिरी से नीतू को देखने लगा शायद वो कुछ ज्यादा ही सुन्दर लग रही थी, चेहरे पर पाउडर, होंठों पर हल्की लिपस्टिक लगाई थी, सलीके से साड़ी पहनी थी।
मेरे लण्ड में तनाव बढ़ गया था तो मैंने जांघिया निकाल दिया और नीतू की जांघ, चूचियाँ, चूत और गाण्ड की कल्पना कर लण्ड को सहलाने लगा। पांच मिनट में ही मैं चरम पर पहुँच गया। फिर तेजी से मुठ करते हुए सारा माल निकाल दिया और नहाकर अपने कमरे में चला गया। क्यूंकि मन और तनाव शांत हो चुका था तो सोचने लगा मैं भी क्या गलत करने की सोच रहा था, अच्छा हुआ जो कुछ किया नहीं, और मैं अपने आप को सामान्य करने में लग गया यह सोचकर कि चलो कहीं घूम कर आते हैं।
उस समय साढ़े नौ बजे थे, मैंने कपड़े पहने, तैयार होकर ताला उठाया और बाहर आ गया।
तो नीतू कहने लगी- भाई साब, कहीं जा रहे हो?
मैंने कहा- हाँ, कोई काम है?
बोली- हाँ…..
मैंने कहा- बोलो !
तो कहने लगी- थोड़ी देर पहले आपके पास आई थी तो आप टीवी देखने में व्यस्त थे।
मैं वापस अपने कमरे में आ गया, पीछे से नीतू आ गई, उसकी आँखें एकदम लाल हो रही थी, होंठ जैसे बोलना चाह रहे थे पर शब्द नहीं नहीं निकल रहे थे, हाथों का कम्पन साफ दिखाई दे रहा था।
उसने मुश्किल से इतना ही कहा- आप हमसे क्या चाहते हो?
मैं चूँकि नियंत्रित था, होश में था, मैंने कहा- कुछ नहीं, बस ऐसे ही मजाक कर रहा था।
मैंने अपनी नजरें नीचे कर ली लेकिन तब तक तक देर हो चुकी थी, नीतू को बहुत समय मिल चुका था, चुदने को तैयार तो वह पहले ही हो चुकी थी, बस नखरे दिखा रही थी।
उस पर मैंने ज्यादा तवज्जो नहीं दी लेकिन इतने समय में उसने अपनी कल्पना में कितने रंग भरे और उड़ानें भरी होंगी, यह तो वही जानती होगी, एकदम कामुक और चुदास हो रही थी वो, सांस लेने में उसके उभार और उभर उभर कर दिखाई दे रहे थे।
समझ नहीं आ रहा था कि यह रूपये का असर है या मेरी बातों का और या उसकी जरुरत का !
मैंने कह दिया- कुछ काम से जा रहा हूँ।
उसने मेरी बातों पर ध्यान नहीं दिया और पल्लू को नीचे गिरा दिया। अब मेरे आँखों के सामने एक फुट की दूरी पर वो संतरे थे जिन्हें दबाकर, निचोड़कर जिनका रस पीने के सपने कई दिनों से देख रहा था। पल्लू गिरते ही समझ आया कि साड़ी भी उसने नाभिदर्शना पहनी है। पतली कमर पर गहरी नाभि देखकर मेरे लण्ड ने सलामी देना शुरु कर दिया, हर पल ऐसे उठ रहा था जैसे ट्रक को जैक लगते समय ट्रक उठता जाता है।
अब मेरा मन बदलने लगा इच्छा होने लगी कि इस ट्रक को सामने वाली की गैराज में रखना ही ठीक होगा, किराया तो दे ही चुका हूँ।
मैंने पहले ही बताया था कि मैं सेक्स का शौकीन हूँ ! प्यासा तो था ही, जब कुंआ खुद मेरे पास आ गया है तो पीने में क्या हर्ज है।

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