मेरी कमुक्त आत्मकता 1

उफ….. ओह्ह … सर मैं मर जाउंगी ! …आपने झूठ कहा था…..कि….उफ…..ज़रा सा रह गया है……..यह तो पूरा फुटा है…..उफ…मेरी योनि में इतनी जगह कहाँ है ! ….उफ…निकालिए इसे….. मैं रोती हुई कह रही थी, मेरा हाथ मेरी दर्द से बिलबिलाती योनि पर चला गया, हाथ चिपचिपे से द्रव्य से सन गया। मैने हाथ को आँखों के सामने ला कर देखा तो और डर गई अंगुलियाँ रक्त से लाल थी, उफ…..मेरी योनि तो जख्मी हो गई….अब क्या होगा…….उफ !
अचानक डबराल सर के हाथ मेरे पेट पर होकर उरोज पर आये और उन्होंने मुझे उठा लिया, अब मैं उनकी गोद में बैठी थी।
उनका मीठा स्वर मेरे कानों में पड़ा- अब तो वाकई पूरा अन्दर चला गया है…. ये तो थोड़ी सी ब्लीडिंग कुमारी छिद्र फटने से होती है ….. अब तुम्हें आनंद ही आनंद आएगा !
उनके हाथ मेरे पेट और उरोज को सहला रहे थे, उनकी बात सच ही थी- अब मेरा दर्द आनंद में बदलने लगा था। मैने अपने हाथ उनकी जाँघों पर टिका कर ऊपर नीचे उठना बैठना शुरू किया तो इसी क्रिया में इतना आनंद आया कि मेरे कंठ से ही नहीं बल्कि डबराल सर के होंठों से भी कामुक ध्वनियाँ फ़ूट रही थी, मैंने अपनी टांगों को पूरी तरह फैला लिया था।
श्वेता भी लगी पड़ी थी, वह पूरी तन्मयता से मेरे स्तनों को चूस रही थी, मैं तो हांफने लगी थी, डबराल सर भी हांफ रहे थे, बस श्वेता कुछ संयत थी।
कुछ देर बाद डबराल सर ने मुझे अपने आगे चित्त लिटा दिया और मेरी एक जांघ पर अपना घुटना रख कर दूसरी जांघ अपने कंधे पर रख ली और संगीतमय अंदाज में अपने लंबे लिंग को अन्दर-बाहर करने लगे। मैं बुरी तरह कांपने लगी थी, मेरे मुख से कामुक आवजें फ़ूट रही थी, श्वेता ने मुद्रा बदल ली थी, उसने मेरे मुख के आगे अपनी योनि कर ली थी और मेरी योनि पर अपना मुख लगा लिया था, वह लंबे से लिंग को झेलती मेरी योनि को चूमने लगी थी, मैं भी पीछे नहीं रही मैने उसकी जाँघों को कस कर पकड़ लिया और उसकी योनि को चूसने लगी।
श्वेता मचल उठी उसने एक टांग मेरी कनपटी पर रख ली, मैं उसके नितंबों की गहराई में छुपी उसकी गुदा (गांड) को भी चाटने लगी।
सर ! ज़रा जोर-जोर से कीजिये ! उफ….उफ… ! मैं टूटे शब्दों में बोली।
डबराल सर ने रफ़्तार बढ़ा दी, मेरी सिसकारियां और भी कामुक हो गई, वो जैसे निर्दयी हो गए थे, उनके नितंबों के मेरे नितंबों से टकराने पर एक अजीब सी थरथराहट होने लगी थी, उत्तेजना में मैंने कालीन में मुट्ठी सी भरी, श्वेता ने पुनः अपनी मुद्रा बदली, उसने मेरे स्तनों को और मेरे अधरों को चूसना शुरु कर दिया, मैं हुच.. हुच. की आवाजों के साथ कालीन पर रगड़ खा रही थी, डबराल सर अपने पूरे जोश में थे, वह मेरे नितंबों को सहलाते तो कभी मेरे पेडू को सहलाते हुए आगे पीछे हो रहे थे।
श्वेता….. किचन में गोले का तेल है जरा लाकर मेरे लिंग पर डाल दो ! डबराल सर ने श्वेता से कहा।
श्वेता तुंरत रसोई में गई और गोले का तेल एक कटोरी में ले आई और उसने तेल की कुछ बूंदें डबराल सर के पिस्टन की तरह चलते लिंग पर डाल दी, अब उसकी गति में और तेजी आ गई, मैं दांतों तले होंठों को दबाये उनके लिंग द्वारा प्राप्त आनंद के सागर में हिलोरें ले रही थी।
डबराल सर चित्त लेट गए और मुझे अपने लिंग पर बिठा लिया मैं स्वयं उपर नीचे होने लगी, हम तीनों को ही पसीना आ गया था, श्वेता ने अपनी योनि डबराल सर के मुख पर लगा दी थी और खुद उनके शरीर पर लेट कर मेरी योनि चाट रही थी, डबराल सर उसकी योनि को अपने हाथों से चौड़ा कर चाट रहे थे।
अचानक डबराल सर का तेवर बदला और उन्होंने बैठ कर मुझे फिर पीठ के बल लिटा दिया और जोर जोर से धक्के मारने लगे, मैं अपने चरम पर आ चुकी थी, अचानक उन्होंने अपना लिंग मेरी योनि से निकाल लिया और श्वेता के मुख में देकर जोर जोर से धक्के मारे और फिर श्वेता के सर को थाम कर ढेर से होते चले गए, वह श्वेता के मुख में ही स्खलित हो गए,
मेरी योनि में अपार आनंद के साथ साथ एक कसक सी रह गई।
श्वेता ने उनके लिंग को छोड़ा नहीं बल्कि उसे चूस चूस कर दोबारा उत्तेजित करने लगी।
डबराल सर ने मेरे स्तनों से खेलना शुरू कर दिया और बोले- क्यों रजनी कैसा रहा…..?
बहुत मजा आया सर ! …. लेकिन मेरी जाँघों का जोड़ तो जैसे सुन्न हो गया है ….. मैंने उनके बालों को सहलाते हुए कहा।
यह सुन्नपन तो ख़त्म हो जायेगा थोड़ी देर में, पहली बार में तो थोड़ा कष्ट उठाना ही पड़ता है, अब तुम श्वेता को देखना इसके साथ इतनी परेशानी नहीं होगी और अगली बार से तुम्हें भी परेशानी नहीं होगी बल्कि सिर्फ मजा आएगा, डबराल सर ने मेरे स्तन को चूसते हुए कहा।
उफ सर…….इन्हें आप चूसते हैं तो कैसी घंटियाँ सी बजती है मेरे शरीर में ! ….. प्लीज सर चूसिये इन्हें ! ………. मैं कामुक तरंग में खेलती हुई बोली।
अच्छा लो में जब तक तुम चाहो, तब तक चूसता हूँ…… यह कह कर डबराल सर मेरे गहरे गुलाबी रंग के निप्पलों को बारी बारी चूसने लगे, मैं आनंदित होने लगी।
शेष अगले भाग में !

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