मेरी कमुक्त आत्मकता 1

उनके स्टेप्स देख कर मेरे शरीर में चींटियाँ सी दौड़ने लगी, मैं नाचना भूल गई थी और चुपचाप आश्चर्य और अजीब से आकर्षण में बंधी उन दोनों के क्रियाकलाप देखने लगी।
डबराल सर ने देखते ही देखते श्वेता की शमीज की जिप खींच कर उसे उसके गोरे शरीर से अलग कर दिया, श्वेता के स्तन किसी फ़ूल की भाँति खिल उठे। डबराल सर ने उन्हें अपने हाथों में संभाल लिया, वे उन्हें बड़े प्रेम से सहलाने लगे, श्वेता उनके पुष्ट नितंबों पर हथेलियाँ टिका कर आँखें बंद किये धीरे-धीरे नाच रही थी, डबराल सर भी हल्के-हल्के थिरकते हुए उसके स्तनों को तो कभी गहरे गुलाबी रंग के निप्पलों को चुटकियों से मसल रहे थे, श्वेता के होंठ बार-बार खुल रहे थे और उसके कंठ से मादक सिसकारियां उभर रही थी।
अचानक ही डबराल सर ने अपना सर झुका कर उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए और उसके अधरों का रस पान करने लगे। श्वेता का शरीर हल्के-हल्के कंपन से भरने लगा था, उसका हाथ अभी भी डबराल सर के नितंबों पर गर्दिश कर रहे थे। सर का लगभग बारह इंच का लिंग अपने पूरे आकार में तन गया था, वह बार – बार झटके लेकर श्वेता की पेंटी के उस स्थान से टकरा रहा था जिसके नीचे उसकी योनि छिपी थी।
मैं भी उत्तेजना के भंवर में फंसती जा रही थी, मेरे हाथ अपनी शमीज में घुस गए थे और अपने कठोर स्तनों को मैं स्वयं ही मसलने लगी थी, इस क्रिया ने मेरे मस्तिस्क को झंकृत कर दिया था, मैं उन्मादित हुई जा रही थी, जाने कब मेरे हाथों ने मेरी शमीज को शरीर से निकाल दिया था, मैं अपने स्तनों को मसलते हुए बार-बार आनंद की हिलोरों में अपनी आँखें बंद कर लेती थी, मेरा हलक प्यास के कांटों से भर गया था, मैं कामोत्तेजना की तरंग के घूंट से पी रही थी, मेरी आँखें खुली तो देखा की अब डबराल सर ने अपने होंठ श्वेता के स्तनों पर लगा दिए थे, वे बारी-बारी से दोनों काम पुष्पों का मानो रस पी रहे थे, श्वेता उनके सर को सहला रही थी और मादक सिसकारियों से उसका कंठ भर गया था, अब उसके हाथों में सर का काफी लंबा और काफी मोटा लिंग मानो एक नई शक्ल पाने जा रहा था।
मैं अपने आप को रोक ना सकी और आगे बढ़ कर श्वेता से लिपट सी गई, मैने भी उसके एक स्तन को थाम लिया और निप्पल को चूसने लगी, अब डबराल सर ने मेरे भारी स्तन थाम लिए और उन्हे मसलते हुए मेरे अधरों को चूसने लगे। श्वेता का एक हाथ मेरी स्कर्ट को नीचे खिसकाने की असफल कोशिश करने लगा तो मैने स्वयं ही अपनी स्कर्ट उतार दी। अब वह मेरी गुलाबी रंग की पेंटी को नीचे खिसकाते हुए मेरे नितंबों में आग जैसी भरने लगी।
डबराल सर ने मुझे नीचे झुकाया तो झुकाते चले गए, मैं पेट के बल झुक गई, श्वेता मेरे बीच पीठ के बल लेट गई, मेरे हाथ कालीन पर टिक गए, मैने अपने नितंब नीचे करने चाहे तो डबराल सर ने उन्हें उपर ही रोक दिया, मेरे घुटने कालीन में जम गए तो डबराल सर मेरे नितंबों को सहलाने लगे, उन्होंने पेंटी पहले ही नीचे कर दी थी जिसे मैने टांगों से निकाल दिया, डबराल सर अपनी जीभ से मेरी योनि चाटने लगे थे, मेरे शरीर में बिजलियाँ दौड़ने लगी थी, श्वेता मेरे नीचे लेटी मेरे स्तनों को मसले जा रही थी, मैं कामुक सीत्कार कर रही थी।
मेरी योनि में मौजूद भंगाकुर को मानो चूस-चूस समाप्त कर देने की कसम ही खा ली थी डबराल सर ने ! उनकी इस क्रिया ने मेरी नस-नस सुलगा दी थी।

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अचानक उन्होंने मेरी योनि में ढेर सारा थूक लगाया और अपने चिकने लिंग मुंड को योनि द्वार पर टिका कर धक्का मारा, मुझे भारी दर्द महसूस हुआ, लेकिन लिंग-मुंड के फिसल जाने के कारण ज्यादा पीड़ा नहीं हुई।
डबराल सर ने अपने हांथों से मेरी जाँघों को चौड़ा किया और अपनी दो उंगुलियों से योनि को चौड़ा कर लिंग-मुंड को फिर से फंसा कर धक्का मारा तो मैं धम्म से श्वेता पर गिर पड़ी, श्वेता भी चीख पड़ी, लिंग मुंड फिर भी नहीं घुस पाया।
ओफ्फो…….तुम जरा अपना वजन अपने हाथों पर नहीं रोक सकती ?….. श्वेता इसकी हेल्प करो जरा ! ….. डबराल सर ने मेरे नितंबों को पकड़ कर फिर से उठाते हुए कहा।
मैं भी परेशान सी हो गई थी, शरीर में आग लगी थी और अभी तक लिंग भी प्रवेश नहीं हुआ था।
जरा आराम से करो !….. श्वेता मेरे कन्धों को थाम कर बोली।
डबराल सर ने इस बार फिर योनि के द्वार को चौड़ा कर लिंग मुंड फंसाया और मेरी पतली कमर पकड़ कर हल्का सा धक्का दिया, लिंग मुंड योनि को लगभग फाड़ते हुए उसमें उतर गया।
दर्द के मारे मेरी चीख निकल गई ….. आ ई ई ई ऊई मां मर गई मैं तो !….. लिंग है या जलता हुआ लोहा !…. प्लीज…. निकालो इसे ! … मैं टूटे शब्दों में इतना ही कह पाई थी कि डबराल सर ने मेरी पतली कमर पकड़ कर थोड़ा पीछे हट कर एक धक्का और मारा, मैं बुरी तरह चीखी- उफ ….. आई… मां प्लीज … सर प्लीज ओह….
और दर्द के मारे मैं आगे कुछ नहीं कह पाई, और अपने सर को कालीन से सटा लिया, मेरी आँखों के आगे तारे से नाच गए थे।
श्वेता मेरे नीचे से निकल गई थी उसने मेरी पीठ को सहलाते हुए कहा- बस …. यार… ! हो गया काम ! …. तू तो बड़ी हिम्मत वाली है ! पूरा का पूरा अन्दर ले गई ! इतनी हिम्मत तो मुझमें भी नहीं थी।
पूरा चला गया….? मैं कराहती सी बोली।
हाँ बस एक दो इंच बचा है……! श्वेता मेरे नितंबों को चूमते हुए बोली।
ओह्ह….उफ…अब इतना दर्द नहीं है….. सर … एक दो इंच ही रह गया है तो ….. उसे भी अन्दर कर दीजिये … मैं झेल लूंगी …. मैने कहा। अब मुझे क्या पता था कि श्वेता झूठ बोल रही है, लिंग अभी आधा बाहर ही है, मैने इसलिए पूरे के लिए कह दिया था कि उसके द्बारा मिला दर्द अब अनोखी सी ठण्डक में बदल गया था।
गुड… तुम तो बहुत ताकतवर हो रजनी …. आई लव यू … इतना कह कर डबराल सर ने मेरे नितंब थपथपाये और लिंग को दो तीन इंच पीछे खीच कर एक जोर का धक्का मारा, मेरा चेहरा कालीन पर घिसटता हुआ सा आगे सरक गया, मुझे लगा लिंग मुंड मेरी पसलियों से टकरा गया है, मेरे हलक से मर्माहत चीख निकली, मेरा हाथ मेरे पेडू पर पहुँच गया, सपाट पेट में एक राड सी चीज का सहज ही आभास हो रहा था, पसलियों से चार छः अंगुल ही दूर रह गया था शायद वह जलता हुआ मांस-दंड !

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