मेरी कमुक्त आत्मकता 1

अरे…तू खड़ी क्यूँ है ?….. शुरू हो जा….! श्वेता ने मटकते हुए कहा।
मैं चुप रही और उसके अंदाज देखने लगी। उसकी घुटनों से ऊँची स्कर्ट बार-बार ऊपर उड़ती थी और उसकी केले के तने जैसी चिकनी और गोरी जांघें बार-बार चमक रही थी, उसके चौड़े कूल्हे भी उत्तेजक ढंग से संचालित हो रहे थे, शर्ट में कैद अर्ध-विकसित स्तन जो कि अमरुद के आकार के थे, बार-बार हिल रहे थे। उसने शर्ट के तीन बटन भी खोल रखे थे, जहां से गोरे चिट्टे सीने का गुलाबी रंग स्पष्ट नजर आ रहा था।
उसी समय डबराल सर कमरे में आये, उनके हाथों में दो बीयर थी और तीन ग्लास थे।
वे श्वेता से बोले- श्वेता ….! पहले कुछ पी लो ! फिर नाचना, कम..आन…….बैठो रजनी तुम भी बैठो ! डबराल सर ने कहा।
श्वेता ने नाचना बंद कर दिया और मेरा हाथ पकड़ कर बैठती हुई बोली- बैठ ना यार ! कैसे अजनबी की तरह खड़ी है …. भूल जा सब कुछ……इस समय डबराल सर हमारे टीचर नहीं बल्कि हमारे फ्रेन्ड हैं…. कम…. आन…..
मैं उसके साथ बैठ गई।
श्वेता ने एक टांग पूरी फैला ली थी, दूसरी का घुटना ऊपर को मोड़ लिया था और एक हाथ को कालीन पर टिका दिया था, टांगों की विपरीत मुद्रा के कारण उसकी स्कर्ट उसकी चिकनी जाँघों से काफी ऊपर तक हट गई थी यहाँ तक कि उसकी आसमानी रंग की पेंटी की किनारी भी दिख रही थी, मगर उसे इस बात की खबर ही नहीं थी।
डबराल सर ने तीनों ग्लासों में बीयर डाली और हम दोनों से कहा- उठाओ भई अपने ग्लास !
उन्होंने खुद भी एक ग्लास उठा लिया था, श्वेता ने भी एक ग्लास उठाया तो मैने भी ग्लास उठा लिया।
मैं पालथी मारकर बैठी थी इसलिए मेरी स्कर्ट में मेरी टाँगे छुपी हुई थी, मेरी शर्ट के भी सभी बटन लगे हुए थे, बीयर मेरे लिए नई चीज नहीं थी, मैं पहले कह चुकी हूँ कि मैं एक धनी परिवार से हूँ, इसलिए कई बार कई पार्टियों में मैं बीयर चख चुकी हूँ।
डबराल सर ने हमारे ग्लासों से अपना ग्लास टकराकर कहा- चियर्स….. ! तुम दोनों के विज्ञान में पास हो जाने की गारंटी की ख़ुशी में……यह कह कर उन्होंने अपना ग्लास अपने मुख से ना लगाकर श्वेता के मुख से लगा दिया तो श्वेता ने उसमें से एक घूंट भर लिया। श्वेता ने अपना ग्लास मेरे होठों से लगा दिया, मैंने असमंजस की स्थिति में उसमे से एक घूंट भर लिया और यंत्रवत अपने ग्लास को डबराल सर के होंठों से लगा दिया, डबराल सर ने एक घूंट भर लिया और फिर हम अपने-अपने ग्लासों से बीयर पीने लगे।
डबराल सर पैंतीस छत्तीस साल के आकर्षक व्यक्ति थे। उनका कद साढ़े पांच फुट या उससे दो एक इंच ज्यादा था, शरीर गठीला था इसलिए हरेक ड्रेस में जंचते थे। इस समय उन्होंने कुर्ते के नीचे लुंगी पहनी हुई थी, कुर्ते के चांदी के बटन खुले हुए थे, जहां से उनके चौड़े सीने के काले-काले घुंघराले बाल दिख रहे थे। यूँ तो मैंने इससे पहले अपने पिता के सीने के बाल देखे थे पर जैसी फिलिंग मुझे इस समय हुई वैसी फिलिंग पहले कभी नहीं हुई थी। उन्होंने भी एक घुटने की पालथी मारी हुई थी और दूसरे को ऊपर उठाया हुआ था। ऊपर उठे घुटने से लुंगी नीचे ढलक गई थी, इस कारण उनकी जांघ भी अंतिम छोर तक दिख रही थी। यूँ तो पूरी टांग पर ही घुंघराले बाल थे पर जांघ पर कुछ ज्यादा ही थे। वयस्क पुरुष की जांघ इस हद तक नंगी मैं पहली बार देख रही थी।
कैसे चुप हो रजनी….. क्या कुछ सोच रही हो? डबराल सर ने कहा।
जी….जी…..नहीं तो ……! मैंने अपनी नजर उनकी जांघ से हटा कर कहा और ग्लास में से अंतिम घूंट भर कर ग्लास खाली किया।
हालांकि सीलिंग फेन चल रहा था फिर भी मुझे कुछ गर्मी महसूस हुई, बगलों में पसीना भी महसूस हो रहा था, ऐसी ही स्थिति शायद श्वेता ने भी महसूस की, तभी तो उसने अपनी शर्ट का एक बटन और खोल कर कहा- उफ ! ज़रा से स्टेप्स में ही कितनी गर्मी लग रही है ! एक और बटन के खुल जाने से उसकी शमीज का जरा सा हिस्सा प्रकट हो गया और स्तनों का ऊपरी भाग जहां शमीज नहीं थी उजागर हो गया।

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अब नाचो भई ! जब थोड़ा थक जाओ तो फिर बीयर का दौर चल जाएगा !…. सर ने कहा।
श्वेता तुरंत खड़ी हो गई और उसने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे भी उठा लिया, मैं यंत्रवत सी उठ गई।
श्वेता ने म्यूजिक सिस्टम की आवाज जरा बढ़ा दी और फिर थिरकने लगी, वह मुझे भी अपने साथ नचाने लगी, मेरे भी पांव उठ गए, कमरे में गूंजती अंग्रेजी संगीत की स्वर लहरियां कामुकता के स्वर में डूबती जा रही थी और मेरे साथ थिरकती श्वेता की हरकतें शरारतों का रूप लेती जा रही थी। वह जब-तब मेरी कमर में हाथ डाल कर उसे मेरे सुडौल नितंबों तक ले जाती, वहाँ से स्कर्ट को उपर सरका कर अपने हाथ उपर ले आती, कभी स्कर्ट को कमर तक घसीट लाती और मेरी जांघें पूरी की पूरी नग्न हो जाती या फिर मेरे गालों पर चुम्बन ही जड़ देती या मेरी बगल में हाथ डाल कर मेरे उन्नत व कठोर स्तनों को ही दबा जाती।
मेरे युवा शरीर में उसकी इन छेड़खानियों से एक रस सा घुलता जा रहा था, उसी रस के नशे में डूब कर मैं उसकी किसी भी हरकत का विरोध नहीं कर रही थी बल्कि स्वयं भी कई बार उसकी हरकतों का अनुसरण करते हुए उसके घुटनों पर हाथ ले जाकर हाथ को उसकी स्कर्ट में डाल देती या फिर उसकी कमर में हाथ डाल कर उसके हिलते स्तनों को पुश कर देती, हम दोनों के इस डांस का डबराल सर आँख फाड़-फाड़ आनंद ले रहे थे।
पन्द्रह मिनट तक लगातार नाच कर श्वेता ने मेरा साथ छोड़ दिया और डबराल सर के पास जाकर बैठ गई, मैं भी रुक गई और उसके पास जाकर बैठ गई।
उफ…. यार डबराल ! …. गर्मी बहुत है ! …. शर्ट उतारनी पड़ेगी !….. तुम बीयर डालो…. ! श्वेता ने लापरवाही से यह कहते हुए शर्ट के सारे बटन खोल कर उतार दिया और एक कोने में डाल दिया।
उसके तने हुए स्तनों पर एक मात्र पारदर्शी शमीज रह गई, शमीज में से स्तनों के गुलाबीपन का पूरा नजारा हो रहा था, स्तनों की कठोर घुन्डियाँ शमीज में उभरी हुई थी।
डबराल सर तीनों ग्लासों में बीयर डाल रहे थे, पसीना मुझे भी आ रहा था, मेरी कनपटियाँ बगलें और सीना पसीने से भीग रहे थे।

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