मेरी कमुक्त आत्मकता 2

इस घटना के बाद मैं खुद ही सेक्स संबंधों के प्रति आवश्यकता से अधिक झुकती चली गई।
जब तक उस स्कूल में रही तब तक प्रिंसीपल और डबराल सर के साथ मैने अनेक बार सम्बन्ध बनाये, किसी नये व्यक्ति से संबंध बनाने की जिज्ञासा तो मुझे रहती थी किन्तु मैं नये व्यक्ति से जुड़ने की पहल नहीं करती थी, हालांकि कई हम-उम्र लड़के कई बार मुझसे फ्रेंडशिप करने का प्रयास कर चुके थे, लेकिन जो परिपक्व अनुभव मुझे डबराल सर और प्रिंसीपल से मिला था उसकी तुलना में ये लड़के बिलकुल मूर्ख लगते थे।
एक लड़का जो कि काफी हेंडसम और अच्छी शक्ल सूरत का था, उसका नाम राजेन्द्र था, उसने कई बार मुझे अनेक प्रकार से अप्रोच किया कि मैं उससे एकांत में सिर्फ एक बार मुलाक़ात कर लूँ ! अंततः एक दिन मैने उससे मिलने का फैसला कर ही लिया और मौका देख कर स्कूल की काफी बड़ी बिल्डिंग के उस कमरे में उसे बुला लिया जो हमेशा ही सूना पड़ा रहता था।
राजेद्र ठीक समय पर कमरे में पहुँच गया, उसके चेहरे पर प्रसनत्ता के भाव टपक रहे थे। उसने मुझे पहले ही से वहाँ पाया तो एकदम घबरा कर बोला- हेलो…. ! हेलो…..रजनी ! ……..सोरी …. ! मुझे आने में जरा देर ही गई।
मैं उसकी घबराहट को देख कर मुस्कुराई, मुझे डबराल सर और प्रिंसीपल सर के अनुभव ने मेरी उम्र से काफी आगे निकाल दिया था।
कमरे का दरवाजा बंद करके सिटकनी चढ़ा दो ! मैने कहा।
मैं एक मेज़ से नितंब टिकाये खड़ी थी, राजेन्द्र ने दरवाजा बंद करके सिटकनी चढ़ा दी और मेरे पास आ खड़ा हुआ।
हाँ…. ! अब बताओ राजेन्द्र कि तुम मुझसे अकेले में क्यों मिलना चाहते थे? मैं उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में झाँक कर बोली।
राजेन्द्र एक उन्नीस बीस की उम्र का अच्छे शरीर का लड़का था, उसने स्कूल ड्रेस वाली पेंट शर्ट पहन रखी थी।
वो क्या है कि ….. मैं तुमसे दोस्ती करना चाहता हूँ ….. राजेन्द्र बोला।
दोस्ती… ? वो किसलिए…….? मैंने प्रश्न किया।
अं…. मेरे प्रश्न पर वो थोड़ा चौंका और फिर बोला- जिस लिए की जाती है उस लिये.. !!.
यही तो मैं भी जानना चाहती हूँ कि दोस्ती किस लिए की जाती है और वो दोस्ती ख़ास कर जो तुम जैसे हेंडसम और स्मार्ट लड़के मेरी जैसी भारी सेक्स अपील वाली लड़की से करते हैं ….. मैंने होठों पर एक रह्स्यमयी मुस्कान सजा कर कहा।
क्या …. क्या मतलब है तुम्हारे कहने का …. ! उसने बिगड़ने का अभिनय किया।
मैंने कहा- मतलब तो आइने की भाँति बिलकुल साफ़ है ! हाँ यह बात अलग है कि तुम आसानी से उसे स्वीकार नहीं करोगे ….. इसलिए तुम्हारे मुझसे दोस्ती करने के उद्देश्य को मैं ही बता देती हूँ- तुम या स्कूल के कई अन्य लड़के मुझसे इसलिए दोस्ती करना चाहते हो ताकि वो मेरी उभरती जवानी का मजा लूट सकें, मेरे उफनते यौवन के समुद्र में गोते लगा सकें !
मैंने आगे कहना जारी रखा- केवल हाँ या नहीं में उत्तर देना …. क्या मैंने गलत कहा है ……. ! क्या तुम्हारी नजरें मेरी शर्ट में से उत्तेजक ढंग से उभरते भारी स्तनों को ताकती नहीं रहती? क्या तुम स्कर्ट में ढके मेरे नितंबों पर दृष्टि टिका कर यह हसरत नहीं महसूस करते कि काश यह सुडौल ढलान हमारे सामने साक्षात प्रकट हो जाएँ !
मैंने ऐसा कहा तो वह चुप होकर दृष्टि चुराने लगा।
मैंने मन ही मन उसकी मनःस्थिति का मजा सा चखा !
फिर बोली- चुप क्यों हो गए? अरे भई, ये तो एक कॉमन सी बात है .. जैसे तुम मुझसे सिर्फ इसलिए दोस्ती करना चाहते हो कि मेरे यौवन को चख सको, वैसे ही मैंने भी तुम्हें आज अकेले में इस लिए बुलाया है कि मैं भी देख सकूँ कि तुम्हारे जैसे लड़के में कितना दम है! क्या तुम मुझे वो आनंद दे सकते हो जिसकी मुझे जरुरत है ! कम-ऑन ! जो तुम देखना चाहते हो मैं स्वयं ही दिखा देती हूँ।
यह कहते हुए मैंने अपनी शर्ट को स्कर्ट में से निकाल कर उसके सारे बटन खोल दिये।
अब मेरे स्तन पहले से काफी भारी हो गये थे, इसलिए जालीदार ब्रा पहनने लगी थी।
शर्ट के खुलने से मेरी गुलाबी रंग की ब्रा दिखने लगी, उसकी झीनी कढ़ाईदार जाली में से भरे भरे गुलाबी स्तन झाँक रहे थे, गहरे गुलाबी रंग की उनकी चोटियाँ थोड़ी और ऊँची उठ आई थी, कारण था डबराल द्बारा इनका अत्यधिक पान, यानी मेरी योनि से ज्यादा वे मेरे स्तनों को चूसा करते थे, इस कारण चोटियाँ भी नुकीली हो गई थी और स्तन भी वजनी हो गये थे।

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राजेन्द्र की आँखें फटे फटे से अंदाज में मेरे ब्रा से ढके स्तनों पर जम गई, उसने अपने शुष्क होते होठों पर जीभ फिराई।
कम-ऑन …. तुम्हें पूरी छूट है ….. जो करना है करो ….. मैंने उससे कहा और शर्ट को बाजुओं से निकाल कर मेज़ पर रख दिया।
ओह रजनी ……. ! यू आर सो ग्रेट ! यह उद्दगार व्यक्त करता हुआ राजेन्द्र बढ़ा और उसने मेरे स्तनों को हाथों में संभालते हुए अपने शुष्क होंठों को मेरे लरजते नर्म अधरों पर रख दिये। मैंने उसकी कमर में हाथ डाल दिये और उसकी शर्ट का हिस्सा उसकी पेंट में से खींच कर उसकी टी शर्ट में हाथ डाल उसकी पीठ को सहलाने लगी, मेरी पतली अंगुलियां उसकी पेंट की बेल्ट के नीचे जाकर उसके नितंबों को छू आती थी।
राजेन्द्र ने काम-प्रेरित होते हुए मेरी ब्रा के हूक खोल दिये, मेरी ब्रा ढीली हो गई, राजेन्द्र ने दोनों कपों को स्तनों से नीचे कर दिये, मेरे गुलाबी रंग के दोनों काम पर्वत इधर उधर तन गये, राजेन्द्र उन्हें मसलने लगा तो मैं बोली- उफ…. ओह्ह ….. इनके निप्पलों को चूसो …..! चूसो राजेन्द्र ! ….. हाथ की जगह अपने होंठों से काम लो ….. उफ …..
यह कहते हुए मेरे हाथों ने उसकी पेंट की बेल्ट खोल कर उसकी पेंट को नीचे सरका दिया, पेंट उसकी मजबूत जांघों में फंस कर रुक गई, उसने एक टाईट फ्रेंची अंडरवियर पहन रखा था, मैं उसकी फ्रेंची को भी नीचे सरकाने लगी।
राजेन्द्र भी पीछे नहीं रहा था, उसने मेरे स्तनों को दुलारते दुलारते मेरी स्कर्ट को ऊपर करके मेरी पेंटी नीचे सरका दी थी जिसे मैंने पैरों से बिलकुल निकाल दिया, उसके हाथ अब मेरी जाँघों को सहलाते सहलाते मेरी फड़फड़ाती योनि से भी अठखेलियाँ कर आते थे, मैं बार बार मचल उठती थी, मेरे शरीर में कामुक प्यास जागृत हो चुकी थी।

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