मेरी माँ और तीन लुंड की कहानी

हाय दोस्तो, मैं आज आपके सामने एक सच्ची हिंदी एडल्ट स्टोरी प्रस्तुत कर रहा हूँ जो मेरी अपनी मम्मी की है.
वैसे तो सभी लोग माँ की बड़ी इज्जत करते हैं लेकिन जब मम्मी ही इतनी बेशर्म हो जाएं कि वो तो हमेशा लंड के चक्कर में ही रहें, तो इसमें बेटे का क्या कसूर है.

यह स्टोरी उस वक्त की है, जब मैं स्कूल में पढ़ता था, उन दिनों मैं शाम के समय गांव के सारे बच्चों के साथ मिलकर छुपा छुपी का खेल खेलता था. उस खेल में सभी बच्चे छुप जाते थे और एक बच्चा उन सबको ढूँढता था. वो जिसको सबसे पहले पकड़ता, उसे उस बच्चे को अपनी पीठ पर बैठा कर काफी दूर तक घुमाना पड़ता था, इसलिए सभी बच्चे ऐसी जगह जाकर छुपते कि जल्दी से नहीं मिल सकें.

हम अक्सर ऐसी जगह ही छुपते थे लेकिन एक दिन मैं अपने भूसे के छप्पर में जाकर छुप गया. शाम को थोड़ा अंधेरा भी होने लगा था तो अन्दर कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था.
मैं काफी देर तक छुपा रहा तभी मैंने देखा कि कोई अन्दर एक परछाई सी दिखाई पड़ी तो मैंने सोचा कि शायद कोई लड़का मुझे ढूँढने आया है, तो मैं और भी ज्यादा अपने को छुपाने के लिए दुबक गया.

मैंने देखा कि वो परछाई मेरे से दूसरे वाले कोने में जाकर रूक गई.
मैं तो एकटक उसे ही देख रहा था कि कुछ ही देर में दूसरी परछाई भी आई और उसने कुछ खुसुर फुसर की सी आवाज में कहा- भाभी कहाँ हो?
तो मुझे लगा कि यह तो मेरे चाचा की आवाज है. तभी दूसरी तरफ सें आवाज आई कि “इधर आ जाओ.”

अब मैं समझ गया था कि ये तो मेरी मम्मी और चाचा हैं. लेकिन ये यहां क्या कर रहे हैं.
मेरे दिमाग में न जाने क्या क्या विचार आने लगे लेकिन मैं तो बस अपलक उन्हें ही देखता रहा. अन्दर कुछ साफ तो नहीं दिख रहा था लेकिन उनकी परछाई से लग रहा था कि वो जरूर कुछ अलग ही कर रहे हैं.

जब मैं लगातार देख रहा था तो कुछ समझ में आने लगा कि चाचा मम्मी को दीवार के सहारे खड़ा करके अपनी कमर आगे पीछे कर रहे हैं और मम्मी ‘सीइइ.. उम्म्ह… अहह… हय… याह… हाय..’ कर रही हैं.
मेरी तो कुछ समझ में नहीं आया कि वो क्या कर रहे हैं और मम्मी ‘सीईइइ आह…’ क्यों कर रही हैं.

करीब 20 मिनट के बाद चाचा ने मम्मी को छोड़ा तो मम्मी दरवाजे की तरफ आकर अपने कपड़े ठीक करके बाहर चली गईं. चाचा ने कुछ सामान ऊपर हाथ करके छप्पर की छान के नीचे रख दी और वो भी बाहर चले गए.

मैं यह सब देख कर आश्चर्य में पड़ गया कि आखिर उन्होंने क्या किया है. खैर कुछ ज्यादा जोर ना देकर मैं घर में आ गया और खाना खाकर सोने लगा, लेकिन आज तो नींद मेरी आँखें के नजदीक भी नहीं आ रही थी. मम्मी पापा के पास सो रही थीं और चाचा खेत में चले गए थे.

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वो सीन के बारे में सोचते सोचते पता ही नहीं चला कि कब सुबह हो गई और मम्मी ने मुझे जगाया.

अगले दिन मैंने देखा कि चाचा अभी खेत से नहीं आए हैं और मम्मी खाना बना रही हैं.

अब मैं आपको मेरी मम्मी कुसुम की फिगर के बारे में बताता हूँ कि मम्मी की हाईट करीब 5 फुट दो इंच है, कमर 28 इंच के करीब चूचियां 32 इंच व चूतड़ भी 30-32 के आस पास थे. मम्मी का वजन करीब करीब पचास किलो का होगा, वे एकदम छरहरी देह की हैं.

कल जहां चाचा ने कुछ सामान रखा था, मैं वहां गया और देखने लगा कि चाचा ने वहां पर क्या रखा था. मैं ढूँढने लगा तो मुझे वहां एक सफेद रंग का गुब्बारा मिला, जिसमें ऊपर से गांठ लगा कर बांधा गया था, उसमें कुछ सफेद रंग का गाढ़ा सा पदार्थ भरा था. मैंने वो पहली बार देखा था तो मैंने मम्मी से पूछने का निर्णय किया और उसे अपनी जेब में रख लिया.

घर पर आया तो मम्मी खाना बना कर फ्री हो गई थीं और वो बोलीं- बेटा आज स्कूल नहीं जाना क्या?
मैंने उनकी बात को अनसुनी करते हुए कहा कि मम्मी मुझे एक चीज मिली है.
“जरा दिखा तो वो क्या है?” ये कहते हुए वो मेरे पास आ गईं
मैंने वो चीज निकाल कर मम्मी को दिखाई तो मम्मी उसे देखते ही चौंक गईं और बोलीं- बेटा, ये तुझे कहां से मिली है?
मैंने बताया कि मम्मी यह तो अपने तूड़ी वाले छप्पर के पास पड़ी थी.
वह बोलीं- बेटा यह तो गंदी चीज है, इसे यहां क्यों लाये हो.. लाओ इसे मैं बाहर फेंक दूँगी.

मम्मी ने झट से उसे मेरे हाथ से ले लिया.

शाम को जब चाचा आए तो मैं थोड़ा बाहर की तरफ जाने चला गया और फिर उनकी बातें सुनने लगा. मम्मी चाचा को डांट रही थीं- देवर जी, तुम्हें इतना भी होश नहीं है कि कौन सी चीज कहां फेंकनी चाहिए, कल कंडोम वहीं पर पटक दिया जो धर्म को मिल गया था, यह तो शुक्र है कि वो मेरे पास ले आया, नहीं तो किसी को पता चल जाता तो क्या होता?
चाचा बोले- भाभी मैंने तो ऊपर रखा था.

खैर चाचा ने मम्मी से गलती माफ करने को कहा और खाना खाकर खेत पर चले गए क्योंकि वहां पर पानी चल रहा था.

दोस्तो, यह खेल उनका यूं ही चलता रहा. एक दिन मम्मी ने मुझे एक पैकिट दिया और कहा कि बेटा इसे अपने कचरे के ढेर में फेंक आओ, तो मैं उसे लेकर गया लेकिन मेरा शैतान दिमाग कुछ और ही कह रहा था तो मैंने उसे खेला तो देखा कि उसमें कुछ बालों का गुच्छा सा था जो कम से कम मम्मी के सिर के तो नहीं थे. मैं उन्हें काफी देर तक देखता रहा, फिर मैंने देखा कि उसमें एक कपड़े का टुकड़ा भी था जो खून में सना हुआ था. मैंने उन सब चीजों को कुछ देर देखा फिर फेंक दिया और घर आ गया.

उस दिन पापा घर पर ही थे, वे काम पर नहीं गए थे क्योंकि चाचा 15-20 दिनों के लिए बाहर गए थे.

कुछ देर बाद पड़ोस के गांव का एक आदमी आया और पापा से कहने लगा कि तुम्हारी बुआ सास बहुत बीमार हैं और वो कुसुम से मिलना चाहती हैं.

पापा ने मम्मी से कहा कि कल तुम तुम्हारी बुआ से मिल आओ.
तो वो बोलीं- देवर जी भी नहीं हैं, मैं किसके साथ जाऊं?
पापा ने कहा- तुम धर्म को लेकर चली जाओ.

फिर मैं मम्मी के साथ अगले दिन पास के गांव जो हमारे गांव से करीब 7-8 किमी दूर था.. के लिए तैयार होकर निकल लिया. हम दोनों जैसे ही निकले तो मम्मी ने कुछ सोच कर आम रास्ते से जाने के बजाए छोटे रास्ते से जाने का निर्णय किया जो खेतों के बीचों बीच डोल से जाता था. क्योंकि आम रास्ता दो तीन गांवों से होकर जाता था. इसलिए सीधे ही जाने का निर्णय लिया.

यह बात फरवरी माह की है. मैं मम्मी के पीछे पीछे चल रहा था, चारों तरफ गहरी ओर बड़ी बड़ी सरसों खड़ी थी जिसमें से आदमी ऊपर हाथ करे तो भी नहीं दिखता था, इतनी बड़ी बड़ी सरसों थी.

दोपहर करीब 1 बजे का समय था, हम चले जा रहे थे. मुझे कभी कभी डर भी लगता कि कोई जानवर नहीं आ जाए. लेकिन मम्मी मेरा हौसला बढ़ातीं और हम चले जा रहे थे.

हम करीब तीन चार किमी चले होंगे कि अचानक ही तीन आदमी एक डोल पर बैठे थे, जिन्हें देख कर मम्मी भी एकदम ठिठक गईं और रूक गईं.

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