मैने कैसे चुदाई सीखी

क्लाइटॉरिस के नज़दीक पिसाब का सुराख है और इस के पिच्चे छूट का मुँह. दो साल से में हर रोज नीलू को छोड़ता आया हूँ लेकिन उस की छूट अभी भी कंवारी जैसी ही है. आज भी मूज़े लंड पेल ते वक्त सावधानी रखनी होती है. जब लंड अंदर जाता है तब छूट का सिकुदा हुआ मुँह लंड की टोपी खिसका देता है. अंदर जाने के बाद छूट के स्नायुओं लंड को जाकड़ लेते हाइन. बाहर न्निकल ते वक्त लंड की टोपी फिर मत्थे पर चाड जाती है. इसी लिए चुदाई की शुरुआत में मूज़े होल होल धक्के लगाने पड़ते हाइन. पंडर बीस हलके धक्के खाने के बाद छूट ज़रा नर्म होती है और लंड आसान्नि से आ जा सकता है. उस के बाद ही में नीलू को गहरे और तेज धक्के से छोड़ सकता हूँ. ज़द ने से पहले लॅप लॅप कर के छूट लंड को चुसती है और जब नीलू ज़दती है तब उस की छूट लंड को इतना ज़ोर से जाकड़ लेती है की मानो मूठ मार रही हो. आप ये कहानी पढ़ ने के बाद तय कीजिएगा की चुदाई में ज़्यादा लुफ्ट कौन लेता है, में या नीलू.

देखा आप ने रवि मेरे बारे में क्या सोचतें हाइन ? सच बतौन ? जब में ज़दती हूँ तब मूज़े कोई होश नहीं रहता. बस आनानद आनंद और आनंफ्ड़ का अनुभव ही करती हूँ. मेरी छूट क्या करती है, क्लाइटॉरिस क्या करती है या लंड क्या करता है, में कुच्छ नहीं जानती. कीर, आयेज की कहानी पढ़िए. तेरह साल की उमर तक मेरे मान में सेक्स का कोई ख़याल तक आया नहीं था बाद में में चार साल रेसिडेन्षियल स्कूल में गयी. वहाँ सेक्स के बारे में सोचने का समय ही ना मिला. ऐसा भी नहीं है की मेने सेक्स देखा नहीं था. छ्होटे बच्चों की नून्न्ी मेने देखी थी, वो भी कभी कभी तातार हुई सी. मेरे दिमाग़ पर कोई असर पड़ा नहीं था. असली चुदाई देखने का एक मौका मिला था, मूज़े. वो प्रसंग अभी भी याद है मूज़े. में ग्यारह साल की थी. सिने पर छ्होटे छोटे नींबू जैसी चुचियाँ उभर आई थी और कक में बाल उगे थे. में और दूसरी दो लड़कियाँ स्कूल जा रही थी. हमारी स्कूल गाँव बाहर थी, रास्ते में काई खेत आते थे. गरमी के दिन थे.

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एका एक रास्ते में एक गढ़ी भागी आ रही थी. उस के पिच्चे गढ़ा पड़ा था. दो फुट लूंबा कला और मोटा लंड गढ़े के पेट नीचे ज़ुल रहा था. अचानक गढ़ी रुक गयी और पिसाब करने लगी. गढ़े ने आ के अपना मुँह गढ़ी की भोस में दल कर पिसाब नाक पर लिया. तुरंत उस का लंड ज़्यादा टन गया और पेट से टकराने लगा. पिसाब कर के जैसे गढ़ी खड़ी हहुई की गढ़ा एक छ्चलांग मार उपर चाड गया. एक धक्के में उस का आधा लंड गढ़ी की छूट में घुस गया. में तो देखती ही रह गयी, कुतूहल से. थोड़ी देर रुक ने के बाद धक्का दे कर गढ़ा गढ़ी को छोड़ने लगा, देखते देखते में उस का सारा लंड गढ़ी की छूट में ुअतर गया. ये सब मेरे वास्ते नया नया था. मूज़े दर भी लगा की गढ़ी अब मार जाएगी.

में पूरा खेल देखती लेकिन मेरी सहेली मेरी बाँह पकड़ कर खींच के ले चली और बोली, ऐसा हमें देखना नहीं चाहिए. बाद में मेने सहेली से पुचछा की वो क्या करते थे. वो बोली, पगली, तुज़े पता नहीं है ?नहीं तो, मेने तो ऐसा पहली बार देखा मेने कहा. सहेली शर्म से लाल लाल हो गयी, मेरे कन में मुँह दल के बोली, गढ़ा गढ़ी को छोड़ता था. तब मेने जाना की चुदाई क्या होती है. लेकिन क्यूँ छोड़ता था ?छोड़ने से गढ़ी को बच्चा पैदा होता है. मेरे कच्चे दिमाग़ में ये बातें उतार ना सकी. सेक्स का कोई भाव भी नहीं हुआ. चार साल बाद में जब फूफी के फार्म पर आई तब महॉल बदल गया था.

एक तो मेरा बदन पूरा खिल गया था, खास तौर पर मेरे स्तन. जहाँ में जौन लोगों की नज़र मेरे स्तन पर लगी रहती थी. भोस पर काले काले ज़ंट निकल आए थे. क्लाइटॉरिस क्या और कहाँ है वो में जानती थी और हॉस्टिल की लड़कियों से हॅस्ट-मैथुन भी सीखी थी. कम नसीब से मेरी रूम पार्ट्नर बहुत पुराने विचार की थी इसी लिए हॅस्ट मैथुन का मौका मिलता नहीं था.(दर ये था की यदि वो अतॉरिटीस को बता दे तो मूज़े तुरंत स्कूल में से निकल दिया जे; ऐसे दो तीन किससे बने थे). दूसरे, अब मूज़े सेक्स की फीलिंग होने लगी थी. सिनिमा के हीरो हेरोयिन के सेक्सी सीन देख कर में उत्तेजित हो ने लगी थी. ऐसे दृश्य देखने से मेरी भोस गीली गीली हो जाती थी और हॅस्ट मैथुन का दिल हो जाता था. मौका मिलने पर क्लाइटॉरिस रग़ाद कर हॅस्ट मैथुन कर भी लेती थी. मेरा पति कैसा होगा और मेरे साथ क्या क्या करेगा वो में सोचने लगी थी. मेरी क्यूरीयासिटी का जवाबदे सके ऐसा कोई मेरे निकट नहीं था इसी लिए में सेक्स से सजाग तो हुई लेकिन अंजान भी रही.

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