माँ की वासना 1

एक दो माह ऐसे ही गुजर गये इस बीच मेरा एक छोटा बिज्निस था, वह काफ़ी सफल हुआ और मैं पैसा कमाने लगा एक कार भी खरीद ली माँ मुझ से दूर ही रहती थी मेरे पिता ने भी एक बार उससे पूछा कि अब वह क्यों मेरे साथ बाहर नहीं जाती तो वह टाल गयी एक बार उसने उनसे ही कहा कि वे क्यों नहीं उसे घुमाने ले जाते तो काम ज़्यादा होने का बहाना कर के वे मुकर गये शराब पीना उनका वैसे ही चालू था उस दिन उनमें खूब झगड़ा हुआ और आख़िर माँ रोते हुए अपने कमरे में गई और धाड से दरवाजा लगा लिया.

दूसरे दिन बुधवार को जब मेरे भाई बहन बाहर गये थे, मैंने एक बार फिर साहस करके उसे रविवार को पिक्चर चलने को कहा तो वह चुपचाप मान गई मेरी खुशी का ठिकाना ना रहा और मैं उससे लिपट गया उसने भी मेरे सीने पर सिर टिकाकर आँखें बंद कर लीं मैंने उसे कस कर बाँहों में भर लिया

यह बड़ा मधुर क्षण था हमारा संबंध गहरा होने का और पूरा बदल जाने का यह चिन्ह था मैंने प्यार से उसकी पीठ और कंधे पर हाथ फेरे और धीरे से उसके नितंबों को सहलाया वह कुछ ना बोली और मुझसे और कस कर लिपट गयी मैंने उसकी ठुड्डी पकड़ कर उसका सिर उठाया और उसकी आँखों में झाँकता हुआ बोला “अम्मा, मैं तुझे बहुत प्यार करता हूँ, जो भी हो, मैं तुझे अकेला नहीं रहने दूँगा”

फिर झुक कर मैंने उसके गाल और आँखें चूमी और साहस करके अपने होंठ उसके होंठों पर रख दिए माँ बिलकुल नहीं विचलित हुई बल्कि मेरे चुंबन का मीठा प्रतिसाद उसने मुझे दिया मेरी माँ का वह पहला चुंबन मेरे लिए अमृत से ज़्यादा मीठा था

उसके बाद तो उसमें बहुत बदलाव आ गया हमेशा वह मेरी राह देखा करती थी और लाई हुई वेणी बड़े प्यार से अपने बालों में पहन लेती थी जब भी हम अकेले होते, एक दूसरे के आलिंगन में बँध जाते और मैं उसके शरीर को सहलाकार अपनी कुछ प्यास बुझा लेता माँ का यह बदला रूप सबने देखा और खुश हुए कि माँ अब कितनी खुश दिखती है मेरी बहन ने तो मज़ाक में यह भी कहा कि इतना बड़ा और जवान होने पर भी मैं छोटे बच्चे जैसा माँ के पीछे घूमता हूँ मैंने जवाब दिया की आख़िर अम्मा का अकेलापन कुछ तो दूर करना हमारा कर्तव्य है

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उस रविवार को अम्मा ने एक बहुत बारीक शिफान की साड़ी और एकदम तंग ब्लओज़ पहना उसके स्तनो का उभार और नितंबों की गोलाई उनमें निखार आया था वह बिलकुल जवान लग रही थी और सिनेमा हाल में काफ़ी लोग उसकी ओर देख रहे थे वह मुझसे बस सात आठ साल बड़ी लग रही थी इसलिए लोगों को यही लगा होगा कि हमारी जोड़ी है

पिक्चर बड़ी रोमान्टिक थी माँ ने हमेशा की तरह मेरे कंधे पर सिर रख दिया और मैंने उसके कंधों को अपनी बाँह में घेरकर उसे पास खींच लिया पिक्चर के बाद हम पार्क में गये रात काफ़ी सुहानी थी माँ ने मेरी ओर देखकर कहा “राज बेटे, तू ने मुझे बहुत सुख दिया है इतने दिन तूने धीरज रखा आज मुझे बहुत अच्छा लग रहा है”

मैंने माँ की ओर देख कर कहा “अम्मा, आज तुम बहुत हसीन लग रही हो और सिर्फ़ सुंदर ही नहीं, बल्कि बहुत सेक्सी भी” अम्मा शरमा गयी और हँस कर बोली “राज, अगर तू मेरा बेटा ना होता तो मैं यही समझती कि तू मुझ पर डोरे डाल रहा है”

मैंने उसकी आँखों में आँखें डाल कर कहा “हाँ अम्मा, मैं यही कर रहा हूँ” माँ थोड़ा पीछे हटी और काँपते स्वर में बोली “यह क्या कह रहा है बेटा, मैं तुम्हारी माँ हूँ, तू मेरी कोख से जन्मा है और फिर मेरी शादी हुई है तेरे पिता से”

मैं बोला “अम्मा, उन्होंने तुम्हें जो सुख देना चाहिए वह नहीं दिया है, मुझे आजमा कर देखो, मैं तुम्हे बहुत प्यार और सुख दूँगा” माँ काफ़ी देर चुप रही और फिर बोली “राज, घर चलना चाहिए नहीं तो हम कुछ ऐसा कर बैठेंगे जो एक माँ बेटे को नहीं करना चाहिए तो जिंदगी भर हमें पछताना पड़ेगा”

मैं तडप कर बोला “अम्मा, मैं तुम्हे दुख नहीं पहुँचाना चाहता पर तुम इतनी सुंदर हो कि कभी कभी मुझे लगता है कि काश तुम मेरी माँ ना होतीं तो मैं फिर तुम्हारे साथ चाहे जो कर सकता था” मेरे इस प्यार और चाहत भरे कथन पर माँ खिल उठी और मेरे गालों को सहलाते हुए बोली “मेरे बच्चे, तू भी मुझे बहुत प्यारा लगता है, मैं तो बहुत खुश हूँ कि तेरे जैसा बेटा मुझे मिला है क्या सच में मैं इतनी सुंदर हूँ कि मेरे जवान बेटे को मुझ पर प्रेम आ गया है?” मैंने उसे बाँहों में भरते हुए कहा “हाँ अम्मा, तुम सच में बहुत सुंदर और सेक्सी हो”

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अचानक मेरे सब्र का बाँध टूट गया और मैंने झुक कर माँ का चुंबन ले लिया माँ ने प्रतिकार तो नहीं किया पर एक बुत जैसी चुपचाप मेरी बाँहों में बँधी रही अब मैं और ज़ोर से उसे चूमने लगा सहसा माँ ने भी मेरे चुंबन का जवाब देना शुरू करा दिया उसका सम्यम भी कमजोर हो गया था अब मैं उसके पूरे चेहरे को, गालों को, आँखों को और बालों को बार बार चूमने लगा अपने होंठ फिर माँ के कोमल होंठों पर रख कर जब मैंने अपनी जीभ उनपर लगाई तो उसने मुँह खोल कर अपने मुख का मीठा खजाना मेरे लिए खुला कर दिया

काफ़ी देर की चूमाचाटी के बाद माँ अलग हुई और बोली “राज, बहुत देर हो गयी बेटे, अब घर चलना चाहिए” घर जाते समय जब मैं कार चला रहा था तो माँ मुझ से सट कर मेरे कंधे पर सिर रखकर बैठी थी मैंने कनखियों से देखा कि उस के होंठों पर एक बड़ी मधुर मुस्कान थी

बीच में ही मैंने एक गली में कार रोक कर आश्चर्यचकित हुई माँ को फिर आलिंगन में भर लिया और उसे बेतहाशा चूमने लगा इस बार मैंने अपना हाथ उसके स्तनों पर रखा और उन्हें प्यार से टटोलने लगा माँ थोड़ी घबराई और अपने आप को छुड़ाने की कोशिश करने लगी “राज, हमें यह नहीं करना चाहिए बेटे”

मैंने अपने होंठों से उसका मुँहा बंद कर दिया और उसका गहरा चुंबन लेते हुए उन कोमल भरे हुए स्तनों को हाथ में लेकर हल्के हल्के दबाने लगा बड़े बड़े मांसल उन उरोजो का मेरे हाथ में स्पर्श मुझे बड़ा मादक लग रहा था इन्हीं से मैंने बचपन में दूध पिया था माँ भी अब उत्तेजित हो चली थी और सिसकारियाँ भरते हुए मुझे ज़ोर ज़ोर से चूमने लगी थी फिर किसी तरह से उसने मेरे आलिंगन को तोड़ा और बोली “अब घर चल बेटा”

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