माँ बेटे का प्यार और संस्कार भाग 4

फ़िर मुस्करा कर लाड़ से मेरा चुंबन लेते हुए पलंग पर ओंधी लेट गयी और बोली. “सुन्दर, मैं जानती हूं तू कितना भूखा है दो दिन से. ले , मेरे पीछे के छेद से तेरी भूख कुछ मिटती हो तो उसमें मैथुन कर ले.”

मैंने मां के कहे अनुसार पैंटी के बीच धीरे से छेद काटा और फ़िर उसमें से मां के गुदा में क्रीम लगाकर अपना मचलता लंड धीरे धीरे अंदर उतार दिया. अम्मा को काफ़ी दुखा होगा पर मेरे आनंद के लिये वह एक दो बार सीत्कारने के सिवाय कुछ न बोली. मां के उस नरम सकरे गुदा के छेद को चोदते हुए मुझे उस दिन जो आनंद मिला वह मैं बता नहीं सकता. उसके बाद यह हमेशा की बात हो गयी. माहवारी के उन तीन चार दिनों में रोज एक बार मां मुझे अपनी गांड मारने देती थी.

महने के बाकी स्वस्थ दिनों में वह इससे नाखुश रहती थी क्योंकि उसे दुखता था. पर मैंने धीरे धीरे उसे मना लिया. एक दो बार जब उसने सादे दिनों में मुझे गुदा मैथुन करने दिया तो उसके बाद मैंने उसकी योनि को इतने प्यार से चूसा और जीभ से चोदा कि वह तृप्ति से रो पड़ी. ऐसा एक दो बार होने पर अब वह हफ़्ते में दो तीन बार खुशी खुशी मुझसे गांड मरवा लेती है क्योंकि उसके बाद मैं उसकी बुर घंटों चूस कर उसे इतना सुख देता हूं कि वह निहाल हो जाती है.

और इसीलिये खाना बनाते समय जब मैं पीछे खड़ा होकर उसके स्तन दबाता हूं तो कभी कभी मस्ती में आकर अपना शिश्न उसके गुदा में डाल देता हूं और जब तक वह रोटी बनाये, खड़े खड़े ही उसकी गांड मार लेता हूं.

मेरे कामजीवन की तीव्रता का मुझे पूरा अहसास है. और मैं इसीलिये यही मनाता हूं कि मेरे जैसे और मातृप्रेमी अगर हों, तो वे साहस करें, आगे बढें, क्या पता, उन्हें भी मेरी तरह स्वर्ग सुख मिले. कामदेव से मैं यही प्रार्थना करता हूं कि सब मातृभक्तों की अपनी मां के साथ मादक और मधुर रति करने की इच्छा पूरी करें.

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