माँ बेटे का प्यार और संस्कार भाग 4

गतांक से आगे…………………
रात को सब सो जाने के बाद अम्मा वही साड़ी पहने मेरे कमरे में आयी. आज वह दुल्हन जैसी शरमा रही थी. मुझे लिपट कर बोली. “सुन्दर, आज यह मेरे लिये बड़ी सुहानी रात है, ऐसा प्रेम कर बेटे कि मुझे हमेशा याद रहे. आखिर आज से मैं तेरी पत्नी भी हूं.”

मैंने उसके रूप को आंखें भर कर देखते हुए कहा. “अम्मा, आज से मैं तुम्हें तुम्हारे नाम से बुलाना चाहता हूं, कमला. अकेले में मैं यही कहूंगा. सबके सामने मां कहूंगा.” मां ने लज्जा से लाल हुए अपने मुखड़े को डुलाकर स्वीकृति दे दी.

फ़िर मैं मां की आंखों में झांकता हुआ बोला. “कमला रानी, आज मैं तुम्हें इतना भोगूंगा कि जैसा एक पति को सुहागरात में करना चाहिये. आज मैं तुम्हें अपने बच्चे की मां बना कर रहूंगा. तू फ़िकर मत कर, अगले माह तक हम दूसरी जगह चले जायेंगे.”

अम्म ने अपना सिर मेरी छाती में छुपाते हुए कहा. “ओह सुन्दर, हर पत्नी की यही चाह होती है कि वह अपने पति से गर्भवती हो. आज मेरा ठीक बीच का दिन है. मेरी कोख तैयार है तेरे बीज के लिये मेरे राजा.”

उस रात मैंने अम्मा को मन भर कर भोगा. उसके कपड़े धीरे धीरे निकाले और उसके पल पल होते नग्न शरीर को मन भर कर देखा और प्यार किया. पहले घंटे भर उसके चूत के रस का पान किया और फ़िर उस पर चढ़ बैठा.

उस रात मां को मैंने चार बार चोदा. एक क्षण भी अपना लंड उसकी चूत से बाहर नहीं निकाला. सोने में हमें सुबह के तीन बज गये. इतना वीर्य मैंने उसके गर्भ में छोड़ा कि उसका गर्भवती होना तय था.

उसके बाद मैं इसी ताक में रहता कि कब घर में कोई न हो और मैं अम्मा पर चढ़ जाऊं. मां भी हमेशा संभोग की उत्सुक रहती थी. पहल हमेशा वही करती थी. वह इतनी उत्तेजित रहती थी कि जब भी मैं उसका पेटीकोट उतारता, उसकी चूत को गीला पाता. जब उसने एक दिन चुदते हुए मुझे थोड़ी लजा कर यह बताया कि सिर्फ़ मेरी याद से ही उसकी योनि में से पानी टपकने लगता था, मुझे अपनी जवानी पर बड़ा गर्व महसूस हुआ.

कभी कभी हम ऐसे गरमा जाते कि सावधानी भी ताक पर रख देते. एक दिन जब सब नीचे बैठ कर गप्पें मार रहे थे, मैंने देखा कि अम्मा ऊपर वाले बाथरूम में गयी. मैं भी चुपचाप पीछे हो लिया और दरवाजा खोल कर अंदर चला गया. मां सिटकनी लगाना भूल गयी थी. मैं जब अंदर गया तो वह पॉट पर बैठकर मूत रही थी. मुझे देखकर उसकी काली आंखें आश्चर्य से फ़ैल गईं.

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उसके कुछ कहने के पहले ही मैंने उसे उठाया, घुमा कर उसे झुकने को कहा और साड़ी व पेटीकोट ऊपर करके पीछे से उसकी चूत में लंड डाल दिया. “बेटे कोई आ जायेगा” वह कहती रह गयी पर मैंने उसकी एक न सुनी और वैसे ही पीछे से उसे चोदने लगा. पांच मिनट में मैं ही झड़ गया पर वे इतने मीठे पांच मिनट थे कि घंटे भर के संभोग के बराबर थे.

मेरे शक्तिशाली धक्कों से उसका झुका शरीर हिल जाता और उसका लटकता मंगलसूत्र पेंडुलम जैसा हिलने लगता. झड़ कर मैंने उसके पेटीकोट से ही वीर्य साफ़ किया और हम बाहर आ गये. मां पेटीकोट बदलना चाहता थी पर मैंने मना कर दिया. दिन भर मुझे इस विचार से बहुत उत्तेजना हुई कि मां के पेटीकोट पर मेरा वीर्य लगा है और उसकी चूत से भी मेरा वीर्य टपक रहा है.

हमारा संभोग इसी तरह चलता रहा. एक बार दो दिन तक हमें मैथुन का मौका नहीं मिला तो उस रात वासना से व्याकुल होकर आखिर मैं मां और बापू के कमरे में धीरे से गया. बापू नशे में धुत सो रहे थे और मां भी वहीं बाजू में सो रही थी.

सोते समय उसकी साड़ी उसके वक्षस्थल से हट गयी थी और उसके उन्नत उरोजों का पूरा उभार दिख रहा था. सांस के साथ वे ऊपर नीचे हो रहे थे. मैं तो मानों प्यार और चाहत से पागल हो गया. मां को नींद में से उठाया और जब वह घबरा कर उठी तो उसे चुप रहने का इशारा कर के अपने कमरे में आने को कह कर मैं वापस आ गया.

दो मिनत बाद ही वह मेरे कमरे में थी. मैं उसके कपड़े उतारने लगा और वह बेचारी तंग हो कर मुझे डांटने लगी. “सुन्दर, मैं जानती हूं कि मैं तुम्हारी पत्नी हूं और जब भी तुम बुलाओ, आना मेरा कर्तव्य है, पर ऐसी जोखिम मत उठा बेटे, किसी ने देख लिया तो गड़बड़ हो जायेगा.”

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मैंने अपने मुंह से उसका मुंह बंद कर दिया और साड़ी उतारना छोड़ सिर्फ़ उसे ऊपर कर के उसके सामने बैठ कर उसकी चूत चूसने लगा. क्षण भर में उसका गुस्सा उतर गया और वह मेरे सिर को अपनी जांघों में जकड़ कर कराहते हुए अपनी योनि में घुसी मेरी जीभ का आनंद उठाने लगी. इसके बाद मैंने उसे बिस्तर पर लिटा कर उसे चोद डाला.

मन भर कर चुदने के बाद मां जब अपने कमरे में वापस जा रही थी तो बहुत खुश थी. मुझे बोली. “सुन्दर, जब भी तू चाहे, ऐसे ही बुला लिया कर. मैं आ जाऊंगी.”

अगली रात को तो मां खुले आम अपना तकिया लेकर मेरे कमरे में आ गयी. मैंने पूछा तो हंसते हुए उसने बताया “सुन्दर, तेरे बापू को मैंने आज बता दिया कि उनकी शराब की दुर्गंध की वजह से मुझे नींद नहीं आती इसलिये आज से मैं तुम्हारे कमरे में सोया करूंगी. उन्हें कोई आपत्ति नहीं है. इसलिये मेरे राजा, मेरे लाल, आज से मैं खुले आम तेरे पास सो सकती हूं.”

मैंने उसे भींच कर उसपर चुंबनों की बरसात करते उए कहा. “सच अम्मा? आज से तो फ़िर हम बिलकुल पति पत्नी जैसे एक साथ सो सकेंगे.” उस रात के मैथुन में कुछ और ही मधुरता थी क्योंकि मां को उठ कर वापस जाने की जरूरत नहीं थी और मन भर कर आपस में भोगने के बाद हम एक दूसरे की बांहों में ही सो गये. अब सुबह उठ कर मैं मां को चोद लेता था और फ़िर ही वह उठ कर नीचे जाती थी.

कुछ ही दिन बाद एक रात संभोग के बाद जब मां मेरी बांहों में लिपटी पड़ी थी तब उसने शरमाते हुए मुझे बताया कि वह गर्भवती है. मैं खुशी से उछल पड़ा. आज मां का रूप कुछ और ही था. लाज से गुलाबी हुए चेहरे पर एक निखार सा आ गया था.

मुझे खुशी के साथ कुछ चिंता ही हुई. दूर कहीं जाकर घर बसाना अब जरूरी था. साथ ही बापू और भाई बहन के पालन का भी इंतजाम करना था.

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