कमुक्त आश्रम 4

“विश्वास नहीं होता तो नाप कर देख लो।” मैंने पास रखा फीता उसकी ओर बढ़ा दिया। उसने अपना अँगूठा नापा जो ७ से.मी. निकला। फिर मैंने उसकी नाक पर फीता रख कर नाप लिया। इस दौरान मैं उसके गाल छूने से बाज नहीं आया। काश्मीरी सेब हों जैसे। उसकी नाक का नाप भी ७ से.मी. ही निकला। फिर मैंने कहा, तुम्हारी मध्यमा (बीच की) उँगली मापो। जब उसने नापी तो वह ९ से.मी. निकली। अब मैंने उससे कहा कि अपने कान की लम्बाई नापो। ये काम तो मुझे ही करना था। इस बार मैंने उसका दूसरा गाल भी छू लिया। क्या मस्त मुलायम चिकना स्पर्श था। साली के गाल इतने मस्त हैं तो चूचियाँ तो कमाल की होंगी। ख़ैर कान का नाप भी ९ से.मी., होना ही था।
“अरे ये तो कमाल हो गया?” वह हैरानी से बोली तो मैंने कहा, “मैं बिना नापे तुम्हारी लम्बाई भी बता सकता हूँ।”
“वो कैसे?”
“तुम्हारे हाथ की लम्बाई का ढाई गुणा होगी।” उसने मेरी ओर हैरानी से देखा तो मैंने कहा “नाप कर देख लो।”
“मेरे कार्यक्रम का फ्लो-चार्ट बिल्कुल सही दिशा में जा रहा था। अब उसके नाज़ुक संतरों की बारी थी। चिड़िया अपने आप को बड़ा होशियार समझती थी। पर मैं भी प्रेम-गुरु ऐसी ही नहीं हूँ। मैंने फीता उठाया और ढीले टॉप के अन्दर उसकी काँख से सटा दी। वो क्या बोलती? चुप रही। उसकी काँख सफाचट थी। बालों का नामों-निशान नहीं। थोड़ी सी चूचियों की झलक भी मिल गई। एकदम सख़्त। घुण्डियाँ कड़क। गोरे-गोरे.. इलाहाबादी अमरूद जैसे।

हाथ की लम्बाई ६३ से.मी. निकली। मैंने कहा तुम्हारी लम्बाई १५८ से.मी. यानि कि ५ फीट ३ इंच के आस-पास है।”
“ओह, वेरी गुड, क़माल है जीजू।” उसकी आँखें तो फटी ही रह गईं। वो फिर बोली “जीजू जॉब का भी बताओ ना” मैं उसे प्रभावित करने में सफल हो गया था।
अब कार्यक्रम के दूसरे भाग की अन्तिम लाईन लिखनी थी। मैंने कहा “एक और बात है ऊपर के होंठ और नीचे के होंठ भी बिल्कुल एक समान होते हैं।”
“नहीं ये ग़लत है नीचे के होंठ थोड़े मोटे होते हैं। मेरे होंठ ज़रा ध्यान से देखो, नीचे का मोटा है या नहीं?” निशा अपने मुँह वाले होंठों की बात ही समझ रही थी, उसे क्या पता कि मैं तो चूत के होंठों की बात कर रहा था।
“अरे मैं मुँह के होंठों की नहीं दूसरे होठों की बात कर रहा था। अच्छा चलो बताओ औरतें ज़्यादा बातें क्यों करतीं हैं?” मैंने पूछा।
“क्यों…?” उसने आँखें तरेरते हुए पूछा। वो अब मेरी बात का मतलब कुछ-कुछ समझ रही थी।
“अरे भाई उनके चार होंठ होते हैं ना। दो ऊपर और दो नीचे” मैंने हँसते हुए कहा।
“क्या मतलब…” उसकी निगाह झट से अपनी चूत की ओर चली गई, वहाँ तो अब चूत-रस की बाढ़ ही आ गई थी. उसने झट से तकिया अपनी गोद में रख लिया और फिर बोली, “ओह जीजू, आख़िर तुम अपनी औक़ात पर आ ही गए… मुझे तुमसे कोई बात नहीं करनी। अकेली मज़बूर लड़की जानकर उसे तंग कर रहे हो। मुझे नींद आ रही है।” वो नाराज़ सी हो गई।
प्यार पाठकों और पाठिकाओं, मेरे कार्यक्रम का दूसरा चरण पूरा हो गया था. आप सोच रहे होंगे भला ये क्या बात हुई। लौण्डिया तो नाराज़ होकर सोने जा रही है? थोड़ा सब्र कीजिए अभी मेरा तीसरा चरण पूरा कहाँ हुआ है।
मैं जानता था साली गरम हो चुकी है। उसकी चूत ने दनादन पानी छोड़ना शुरु कर दिया है और अब तो पानी रिस कर उसकी गाँड को भी तर कर रहा होगा। अब तो बस दिल्ली दो क़दम की दूर ही रह गई है। मेरा अनुभव कहता है कि इस तरह की बात के बाद लड़की इतनी ज़ोर से नाराज़ हो जाती है कि बवाल मचा देती है, पर निशा तो बस सोने की ही बात कर रही थी. मैंने बात आगे बढ़ाते हुए कहा
“अरे तुम बुरा मान गई… ये मैं नहीं प्रेम-आश्रम वाले गुरुजी कहते हैं। अच्छा चलो अब सो ही जाते हैं। पर एक समस्या है?”
“वो क्या?”

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“दरअसल मैं सोने से पहले दूध पीता हूँ।”
“ये क्या समस्या है, रसोई में जाकर पी लो।”
“वो… वो… रसोई में लाईट नहीं है ना। बिना लाईट के मुझे डर लगता है।”
“ऐसे तो बड़े शेर बनते हो।”
“तुम भी तो झाँसी की शेरनी हो, तुम ही ला दो ना।”
“मैं.. मैं… ” इतने में ज़ोर की बिजली कड़की और निशा डर के मारे मेरी ख़िसक आई “मुझे भी अँधेरे से डर लगता है।”
“हे भगवान इस प्यासे को कोई मदद नहीं करना चाहता” मैंने तड़पते हुए मजनू की तरह जब शीशे पर हाथ रख एक्टिंग की तो निशा की हँसी निकल गई।
“मैं क्या मदद कर सकती हूँ?” उसने हँसते हुए पूछा
“तुम अपना ही पिला दो।”
“क्या मतलब?” उसने झट से अपना हाथ अपने उरोजों पर रख लिए “जीजू तुम फिर…?”
इतने बड़े अमृत-कलशों में दूध भरा पड़ा है थोड़ा सा पिला दो ना तुम्हारा क्या बिगड़ जाएगा” मैंने लगभग गिड़गिड़ाने के अन्दाज़ में कहा।
तो निशा पहले तो हँस पड़ी फिर नाराज़ होकर बोली,”जीजू तुम हद पार कर रहे हो।”
“अभी पार कहाँ की है तुम कहाँ पार करने दे रही हो?”
“जीजू मुझे नींद आ रही है” उसने आँखें तरेरते हुए कहा।
“हे भगवान क्या ज़माना आ गया है। कोई किसी की मदद नहीं करना चाहता।” निशा हँसते हुए जा रही थी। मैंने अपनी एक्टिंग करनी जारी रखी “सुना है झाँसी के लोगों का दिल बहुत बड़ा होता है पर अब पता चला कि बड़ा नहीं पत्थर होता है और पत्थर ही क्या पूरा पहाड़ ही होता है, टस से मस ही नहीं होता, पिघलता ही नहीं।” निशा हँसते-हँसते दोहरी होती जा रही थी। पर मेरी ऐक्टिंग चालू थी। “हे भगवान, इन ख़ूबसूरत लड़िकयों का दिल इतना पत्थर का क्यों बनाया है, इससे अच्छा तो इन्हें काली-कलूटी ही बना देता कम से कम किसी प्यासे पर तरस तो आ जाता।” मैंने अपनी ऐक्टिंग चालू रखी।
मैं तो शोले वाला वीरू ही बना था “जब कोई दूध का प्यासा मरता है तो अगले जन्म में वो कनख़जूरा या तिलचट्टा बनता है। हे भगवान, मुझे कनख़जूरा या तिलचट्टा बनने से बचा लो। हे भगवान मुझे नहीं तो कम से कम इस झाँसी की रानी को ही बचा लो।”
“क्या मतलब?”

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