कमुक्त आश्रम 4

और फिर नज़ाक़त से वो हल्के-हल्के पाँव बढ़ाते हुए शावर की ओर बढ़ गई। पानी की फुहार उसके गोरे बदन पर पेट से होती हुई उसकी बुर के छोटे-छोटे बालों से होती हुई नीचे गिर रही थी, जैसे वो पेशाब कर रही हो। मैं तो मुँह बाए देखता ही रह गया।
वो गाती जा रही थी “पानी में जले मेरा गोरा बदन…” मैं सोच रहा था आज इसे ठण्डा मैं कर ही दूँगा, घबराओ मत। कोई १० मिनट तक वो फव्वारे के नीचे खड़ी रही, फिर उसने अपनी बुर को पानी से धोया। उसने अपनी उँगलियों से अपनी फाँकें धीरे से चौड़ी कीं जैसे किसी तितली ने अपने पंख उठाए हों। गुलाबी रंग की नाज़ुक सी पंखुड़ियाँ। किशमिश के दाने जितनी मदन-मणि (टींट), माचिस की तीली जितना मूत्र-छेद और उसके एक इंच नीचे स्वर्ग का द्वार, छोटा सा लाल रतनार। मुझे लगा कि मैं तो गश खाकर गिर ही पड़ूँगा।
उसने शावर बन्द कर दिया और तौलिये से शरीर पोंछने लगी। जब वह अपने नितम्ब पोंछ रही थी, एक हल्की सी झलक उसकी नर्म नाज़ुक गाँड की छेद पर भी पड़ ही गई। उफ्फ… क्या क़यामत छुपा रखी थी उसने। अपनी बगलें पोंछने के लिए जब उसने अपनी बाहें उठाईं तो मैं देखकर दंग रह गया। काँख में एक भी बाल नहीं, बिल्कुल मक्खन जैसी चिकनी साफ सुराही गोरी चिट्टी। अब मैं उसे हुस्न कहूँ, बिजली कहूँ, पटाखा कहूँ या क़यामत…
अरश मलशियानी का एक शेर तो कहे बिना नहीं रहा जा रहा:
बला है क़हर है आफ़त है फितना है क़यामत है
इन हसीनों की जवानी को जवानी कौन कहता है?
अब उसने बिना ब्रा और पैन्टी के ही शर्ट (टॉप) और बॉटम पहनना चालू कर दिया। बेल बॉटम पहनते समय मैंने एक बार फिर उसकी चूत पर नज़र डाली। लाल चुकन्दर जितनी छोटी सी, प्यारी सी चूत जैसे मिक्की का ही डबल रोल हो। अब वहाँ रुकने का कोई मतलब नहीं रह गया था। हे भोले शंकर आज मेरी लाज रख लेना कल सोमवार है याद है ना???…
कहानी का अगला भाग शीघ्र ही आपकी नज़र होगा।

मैं सोफ़े पर बैठ गया। जैसी ही बाथरूम का दरवाज़ा खुला गीले बालों से टपकती शबनम जैसी बूँदे, काँपते होंठ, क़मसिन बदन, बेल-बॉटम में कसी पतली-पतली जाँघों के बीच फँसी बुर का इतिहास और भूगोल यानी चीरा और फाँकें साफ़ महसूस हो रही थी। हे भगवान क्या फुलझड़ी है, पटाखा है, या कोई बम है। एक जादुई रोशनी से जैसे पूरा ड्राईंग-रूम ही भर उठा। अचानक एक बार जोर की बिजली कड़की और एक तेज धमाके के साथ पूरे मुहल्ले की लाईट चली गई। हॉल में घुप्प अँधेरा छा गया। उसके साथ ही डर के मार निशा की चीख सी निकल गई, “जीजू, ये क्या हुआ?” वो लगभग दौड़ती हुई फिर मेरी ओर आई। इस बार वह टकराई तो नहीं पर उसकी गरम साँसें मैं अपने पास ज़रूर महसूस कर रहा था।
“लगता है कहीं शॉर्ट-सर्किट हो गया है। तुम डरो मत, यहीं ठहरो, मैं इन्वर्टर चालू करता हूँ।” मैंने दरवाज़े के पास लगा इन्वर्टर चालू किया तो हमारे बेडरूम और स्टडी-रूम की बत्ती जल उठी।
“हे भगवान सब कुछ उल्टा-सीधा आज ही होना है क्या?” निशा रूआँसे स्वर में बोली।
“क्यों क्या हुआ?”
“अब देखो ना लाईट भी चली गई।” उसने एक ठंडी साँस ली।
“पर बेडरूम में तो लाईट है ना।”
“पर मुझे तो कल के वर्कशॉप में प्रेज़ेन्टेशन के लिए प्रोजेक्ट-वर्क तैयार करना था और मेरे लैपटॉप को भी आज ही ख़राब होना था। हे भगवान…”
“कोई बात नहीं तुम स्टडी-रूम में रखे कम्प्यूटर से काम चला सकती हो।” मैंने पूछा “कितना काम है?”
“घंटा भर तो लग ही जाएगा। अच्छी मुसीबत है। मैं भी कहाँ फँस गई इस कम्पनी में।”
“क्यों क्या हुआ?”
“अब देखो ना रोज़-रोज़ का प्रेज़ेन्टेशन, मीटिंग्स, वर्कशॉप, एनालिसिस, प्रोडक्ट लाँचिंग – झमेले ही झमेले हैं इस नन्हीं सी जान पर।”
मैंने अपने मन मे कहा, ‘मेरी जान हम जैसे किसी आशिक़ का दामन थाम लो, सारे प्रोजेक्ट कर दूँगा’ पर मैंने कहा “कौन सा उत्पाद लाँच कर रही हो?”
“दो उत्पाद हैं, एक तो गर्भाधान रोकने की गोली है, महीने में सिर्फ एक गोली और दूसरा बच्चों के अँगूठा चूसने और दाँतों से नाख़ून काटने की आदत से छुटकारा दिलाने की दवाई है, जिसे नाखूनों पर लगाया जाता है।”
“हे भगवान तुम सब लोग हमारी रोज़ी-रोटी छीन लेने पर तुले हो।”
“क्या मतलब?? हम तो बिज़नेस के साथ-साथ समाज सेवा भी कर रहे हैं।” निशा ने हैरानी से पूछा वो बात-बात में ‘क्या मतलब’ ज़रूर बोलती है।

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“अरे भाई साफ़ बात है, तुम गर्भधारण रोकने की दवा की मार्केटिंग करती हो तो बच्चे कहाँ से पैदा होंगे और फिर हमारे उत्पाद जैसे बच्चों का दूध, बच्चों का आहार, बच्चों के तेल, नैप्पी, पावडर, साबुन कौन खरीदेगा?”
“और वो अँगूठा चूसने की आदत छुड़ाने की दवाई?”
“वो भी हम जैसे प्रेमियों के ऊपर उत्याचार ही है।”
“क्या… मत…लब?” निशा मेरा मुँह देखने लगी।
“शादी के बाद वो आदत अपने-आप छूट जाती है… उसकी ज़रूरत ही नहीं पड़ती। शादी के बाद भला कौन उसे अँगूठा चूसने देता है…” मैंने हँसते हुए कहा।
पहले तो मेरी बात उसे समझ ही नहीं आई, लेकिन बाद में तो वो इतने ज़ोर से शरमाई कि पूछो मत। उसने मुझे एक धक्का सा देते हुए कहा “जीजू तुम एक नम्बर के बदमाश हो।”
“नहीं, मैं दो नम्बर का बदमाश हूँ।” मैं खिलखिला कर हँस पड़ा
“जीजू मज़ाक छोड़ो, मुझे अपना प्रोजेक्ट पूरा करना है। कम्प्यूटर कहाँ है?”
“हाँ चलो मुझे भी अपना प्रोजेक्ट बनाना है।”
“अरे आपको कौन सा प्रोजेक्ट बनाना है?”
“अरे तुम नहीं जानती, मुझे एक नहीं पूरे ५ प्रोजेक्ट्स पर काम करना है” अब मैं उसे क्या बताता कि ‘मुझे तुम्हारा दूध पीना है, बुर चाटनी है, अपना लंड चुसवाना है, चुदाई करनी है, और गाँड भी मारनी है।’ हो गए ना पूरे ५ प्रोजेक्ट्स।
“ओह… पर आपके लिए तो ये मामूली सी बात है आप तो बड़े अनुभवी हैं आप तो झट से कार्यक्रम बना ही लेंगे।” वो भले मेरे इन नए उत्पादों के बारे में अभी क्या जानती थी।
“हाँ वो तो ठीक है पर मेरे पास भी समय कम बचा है, केवल २ घंटे और पूरे ५ प्रोजेक्ट्स… ख़ैर छोड़ो पूरा तो कर ही लूँगा। मुझे अपने-आप पर पूरा भरोसा है। आओ स्टडी-रूम में तुम्हें कम्प्यूटर दिखा दूँ।” और फिर हम दोनों स्टडी-रूम में आ गए।
कम्प्यूटर चाली करने के बाद उसने पेन-ड्राईव निकाली और उसे कम्प्यूटर में नीचे बने छेद में डालने की कोशिश की पर वह अन्दर नहीं गया।
“जीजू ये इस छेद में अन्दर क्यों नहीं जा रहा?”

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अरे पीछे वाली छेद में डालो, उसमें आराम से चला जाएगा।” उसने मेरी ओर थोड़े गुस्से से देखा तो मैंने कहा, “अरे भाई ये छेद ख़राब है, इसके पीछे और छेद हैं, उसमें… वो सही है तुम मज़ाक समझ रही हो।” मैंने हँसते हुए कहा।
“आप मेरा लैपटॉप ठीक कर दो ना प्लीज़” मेरी बात काटते हुए निशा बोली।

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