कमीनी कामिनी की गाता भाग 1

प्रिय पाठकों, आप सभी को मेरा वासनामय अभिवादन। पिछली कड़ी में आपनें पढ़ा कि अपनी कामुकता के वशीभूत, किस तरह अपनी सहेली रेखा के पुत्र पंकज की अंकशायिनी बनी। कहां पंकज एक अठारह वर्षीय उभरता नवयुवक, जो अभी लड़कपन की दहलीज से पूरी तरह बाहर भी नहीं निकला था और कहां मैं 41 वर्षीय, पकी पकायी, खेली खायी, उसकी मां के उम्र की अधेड़ कामांध महिला, जो वासना के गर्त में गिर कर न जाने अबतक कितने मर्दों की बांहों में समा चुकी थी। प्रथमद्रष्टया यह बलात्कार लग रहा था, किंतु यह भी सत्य है कि बिना मेरी सहमति के मेरा बलात्कार कत्तई मुमकिन नहीं था। अन्य अवसरों की भांति आज भी जहां पंकज समझ रहा था कि वह जबर्दस्ती मुझसे शारीरिक संबंध बनाने में सफल रहा, वहीं मैं जानती थी मैंने खुद पंकज को मुझ पर हावी होने देकर उसके युवा जिस्म का आनंद लिया।

एक सामान्य गृहिणी रेखा, पति की बेरुखी सहती रेखा, अपने जिस्म की दमित भूख से तप्त रेखा को परपुरूषों से अनैतिक विवाहेतर संबंध बना कर अपने तन की कामेक्षा शांत करने को प्रेरित करके वासना के दलदल में तो पहले ही घसीट चुकी थी, अपने तन की अदम्य भूख से त्रस्त, अब मैं उसके नादान पुत्र (हालांकि नादान कहना शायद गलत होगा, क्योंकि कामक्रीड़ा में जिस तरह की सिद्धहस्तता का परिचय मुझे दिया, वह बड़े बड़े औरतबाज मर्दों की तुलना में कहीं बेहतर था) को भी, उसकी औरतखोरी के नशे को हवा दे कर वासना के गर्त में घसीट लाने का सफल कुत्सित प्रयास कर चुकी थी और मुझ कामांध औरत द्वारा यह प्रयास आगे भी जारी रहेगा यह निश्चित था।

पंकज को तो यह अहसास तक नहीं था कि उसे ऊपरवाले नें कितने कीमती उपहार से नवाजा था और वह अद्वितीय उपहार था उसका अविश्वसनीय रूप से दीर्घ और मोटा लिंग। उसका लिंग न केवल विशाल था, बल्कि उसका सौंदर्य भी चित्ताकर्षक था। भयभीत कर देने वाले उस लिंग के आकार के बावजूद उसकी सुंदरता मनमोहक थी। एक तो उसकी कद काठी, उसपर उसका मनमोहक व्यक्तित्व और तिस पर स्त्रियों का दिल धड़का देने वाला अकल्पनीय रूप से आकर्षक लिंग से लैस, उभरता हुआ नवयुवक था पंकज। तभी मैं सोचूं कि उसनें इतनी सी उम्र में आठ लड़कियों और दो औरतों को फंसाया कैसे। कितना आसान होता होगा लड़कियों को अपनी जाल में फंसा कर हवस का शिकार बनाना, जैसे मैं बनी। खैर मैं तो वैसे भी वासना की भूखी गुड़िया ठहरी।

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मुझे कभी कभी खुद पर और खुद की किस्मत पर आश्चर्य होता है। मेरे जीवन में वासना के इस खेल का आरंभ जब से हुआ, तब से लेकर अब तक प्रायः सब कुछ खुद ब खुद होता गया और कुछ अवसरों पर मेरे थोड़े से प्रयास की आवश्यकता पड़ी, जिसपर ऊपरवाले की कृपादृष्टि सदैव बनी रही। उसने मेरी राह को सुगम बनाने का कोई अवसर नहीं छोड़ा और मैंने मान लिया कि आनंदमय जीवन का उत्तम मार्ग, धारा के विरुद्ध न जा कर धारा की दिशा में बहते जाने में ही है। इसी को मैंने अपने जीवन का दर्शन बना लिया। जरूर इसमें मेरी खूबसूरती और कमनीय देह के आकर्षण का भी योगदान रहा है, लेकिन यह भी तो ऊपरवाले की कृपा ही थी मुझ पर। अब आज ही की बात को ले लीजिए, मेरे रूप लावण्य के कारण पंकज की कामलोलुप दृष्टि मुझ पर पड़ी, मेरी अधेड़ावस्था से उसे कोई फर्क नहीं पड़ा, सहज सुलभ एकांत भी प्राप्त हो गया और तुर्रा यह कि उस लगभग पूर्ण, निर्माणाधीन एकांत कमरे में ऊपरवाले नें एक लकड़ी के तख्तपोश की व्यवस्था भी कर रखी थी। कामगरों के उपयोग में आने वाला वह नंगा तख्तपोश भी उस वक्त शाही बिस्तर से कम आनंददायक नहीं लगा।

पंकज के साथ उस बीस पच्चीस मिनट के प्रथम संसर्ग वाले स्वर्गीय आनंदमय लम्हों को मन में संजोए उस कमरे से पंकज संग निकली तो प्रफुल्लित थी। पंकज प्रफुल्लित था। वह तो पूरा मुझ पर आसक्त हो गया, पागल कहीं का। वहां से जब हम निकले तो अधिक समय नहीं हुआ था और मैं जानती थी कि रेखा उन तीन खड़ूस लोगों से किस तरह की गप्पें मार रही होगी। तीनों तो थे औरतों के रसिया और रेखा जैसी रसीली औरत उनके हाथ लगी थी, ऐसे छोड़ कैसे देते? रेखा, जो खुद भी परपुरूषों से मजे लेने की अभ्यस्त हो चुकी थी, भला ऐसे अवसर का लाभ लेने में कहां पीछे रहती? यही सब सोच कर मैं पंकज के साथ इधर उधर बेमतलब घूमती समय व्यतीत कर रही थी, रेखा और उन ठरकियों को समय देना चाह रही थी। पंकज पर फिर मस्ती चढ़ रही थी। हम घूमते हुए घर के पिछवाड़े बगीचे की ओर बढ़े तो पंकज नें फिर से मेरी कमर पकड़ कर अपनी ओर खींचा,

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“हाय आंटी, आप इतनी मस्त हो कि फिर मन हो रहा है।”

“हट शैतान, अभी ही तो लूटी मेरी….” छिटक कर अलग होने की कोशिश करने लगी।

“क्या लूटा मैं?” वह मुझे दबोच कर चूमने लगा।

“हट बेशरम।” मैं कसमसाते हुए बोली। उसके लिंग में तनाव मैं महसूस कर रही थी। मैं फिर अवश होने लगी।

“अच्छा, अब बेशरम हूं? चुदवाने के बाद तो बड़ी खुश थीं आप?” वह फिर से जोर जबर्दस्ती पर उतर आया था। चूमते हुए मेरे स्तनों को दबाने लगा।

“उफ्फ, मानोगे नहीं?”

“नहीं, आप जैसी औरत तो बड़ी किस्मत से मिली है। जो एक बार चोद ले, बार चोदना चाहेगा।” अब वह मुझे दबोचे वहीं चबूतरे पर बैठ गया। मैं विरोध करती रही किंतु मुझे भी खींच कर बैठा लिया अपनी बगल में। मुझे चूम रहा था, मेरे स्तनों को दबा दबा रहा था और मेरी योनि को सहला रहा था। उफ्फ उस पागल नें तो मुझे करीब करीब दुबारा गरम ही कर दिया था।

“अच्छा बाबा अच्छा, फिर कर लेना, लेकिन अभी नहीं।” मैं बोली।

“अभी क्यों नहीं?”

“तू पहले बता कि इतनी कम उम्र में यह सब कहाँ से सीखा?” मैं उसका ध्यान भटकाने की कोशिश करने लगी।

“बताऊंगा, मगर अभी नहीं, अभी तो चोदने दीजिए।”

“अरे पागल, अंदर तेरी मां बैठी इंतजार कर रही होगी।”

“करने दीजिए।”

“सोचेगी नहीं कि इतनी देर क्यों कर रहे हैं हम?”

“अच्छा अच्छा, अभी नहीं तो कोई बात नहीं, लेकिन सोच लीजिए, तीन दिन छुट्टी है मेरी, तीनों दिन चोदने दीजिएगा ना?”

“हां रे पागल हां। तू एक बार जिसे भोग ले, फिर वह मना कर पाएगी क्या? अभी तो तू ये बता कि यह सब तूने शुरू कब और कैसे किया?”

“ठीक है बताता हूं, लेकिन एक शर्त पर।”

“कैसी शर्त?” मैं शशंकित हो उठी।

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