पुलिस साहब से हवालात में चुद गयी

“चल. चल. ज्यादा नाटक नहीं कर,” एक पोलीस वाला मेरी कलाई पकड़े हुये बोला. और फीर जोर-जबरदस्ती से मुझे पोलीस-वन में बैठा दीया और थाने पहुंच गए हम लोग.

“क्या हुवा श्याम नही मीला?” थानेदार ने मुझे देखते हुये ही पूछा.

जवाब में ना में सीर हीला दीया पुलिसवाले ने.

“चल साली को लाक-उप में बंद कर. अपने आप ही इसका मरद आएगा इसको छुड़ाने,” थानेदार ने अपनी seat पर बैठे बैठे कहा.

मुझे लाक-उप में दाल दीया जोकी उसकी सात के सामने ही थी. पोलीस स्टेशन उस थानेदार के अलावा ५ हवालदार थे. कोई थाने में अंदर आ रहा था तोः कोई बहार जा रहा था. रात के ११ बजने में आ रही थी. इन् २ घंटों में थानेदार मुझे १०० बार घूर चूका था. मुझे अपनी आंखों से तौल रहा था. ऐसे मर्दों की आँखें मुझे पता है कैसी होती है. बाज़ार जाते हुये या मंदीर जाते हुये ऐसी ही नज़रों का सामना में कब से कर रही हूँ. लेकीन तब और आब में सिर्फ एक फरक था. तब मैं अपनी मर्जी की मालीक होती थी और अब्ब हवालात में बेबस कैदी की तरह थाने में.

तभी थानेदार ने अपने हवाल्दारों को बुलाया और २-२ की २ team बाना कर एक को मेरे घर के पास छुपने को कह दीया और दुसरे को बस्स स्टैंड जाने को कह दीया. साथ ही हिदयात देदी की सुबह तक निगरानी रखनी है. अब बचे एक हवालदार के कान में कुछ कहा और वोह हवालदार भी बहार चला गया.

थाने में मैं और वोह थानेदार दो ही बचे थे. हवालात में और कोई कैदी भी नही था. मुझे उसके इरादे अच्छे नही लग रहे थे. वोह अपनी कमीज उतार कर कोई filmi गाना गाते हुये अपनी seat पर बैठ गया और मुझे घूरने लगा. अब थानेदार मुझे लगातार घूर रहा था और उसके होंठों में एक कुटील मुस्कान आ रही थी और जा रही थी.

और कहानिया   दीवाली में फटके नही बल्कि छूट फोड़ा

तभी लास्ट वाला हवालदार एक कागज का पैकेट थानेदार के हाथ में पकडा दीया और एक ग्लास और पानी की बोत्त्ले उसकी टेबल पर रख दीया. फीर हवालदार थानेदार का इशारा पाकर थाने से बहार चला गया. थानेदार ने कागज के पैकेट से एक बोत्त्ले बहार निकली.

“दारु!” मैं मन् में सोचकर कांप उठी. “दारु पीकर थानेदार अकेले हवालात में और मैं भी थाने में अकेली…”

थानेदार ने आधे गांठे में ४-५ पैग बाना कर दारु पी डाली और उठ खड़ा हुवा. उसकी चाल में कोई फरक नही था लेकीन आंखों में दारु का नशा और वासना दोनो झलक रहा था. उसने मैं गेट के पास जाकर गेट को बंद कीया और कड़ी लगा दी. अब मेरे हवालात की तरफ आ कर उसका ताला खोल कर मैन गेट पर लगा दीया और चाबी जेब मैं दाल ली. फीर मेरी तरफ बढने लगा. मेरी रूह कांप रही थी.

“बोल कीधर है तेरा मरद.”

मैं चुप चाप रही.

“अबे साली, तेरा मरद है की नही?”

“……”

“लगता है तेरा मरद नही है. अब मुझे ही कुछ करना पड़ेगा.”

“…….”

मेरे नजदीक आ कर मेरे हाथों को पकड़ लीया और झुमते हुये बोला, “कीसी का हाथ पकडा नही या हाथ छोड़ कर चला गया.”

मैंने अपने हाथ को चुडाते हुये कहा, “साहेब आपने पी ली है. अभी बात नही करो मुझसे.”

“वह… क्या idea दी है तूने. अभी बात में time वास्ते नही करने का… अभी काम करने का…”

“साहेब छोडो मुझे.”

“क्या बोली तुम. चोदो मुझे,” बड़ी बेशर्मी से हँसते हुये थानेदार बोला.

“ऐसी गंदी बात करते हुये तुम्हे शरम नही आती…” मैंने वीरोध कीया.

“अच्छा तुझे मालूम है की क्या गंदी है और क्या अच्छी. यानिके तुझे सुब मालूम लगता है. चोदो… चुदाई… सुब मालूम है तुझे,” बड़ी बेशर्मी से बोलता जा रहा था.

मैंने अपने कान बंद कर लीये और मदद के लीये चिल्लाने लगी. तभी एक झन्नाटेदार थप्पड़ मेरे गलों पर पड़ा.

और कहानिया   वीर्य से खेली होली

“साली. रांड. चील्लाती है. एक तो श्याम का पता नहीं बता रही है और पूछताछ में चिल्लाती है,” कहते हुये थानेदार मेरी साड़ी को खींचने लगा और बोला, “चिल्ला. जीतना चिल्लाना है चिल्ला. देखता हूँ मैन कौन आता है इधर.”

मैन बेबस चिल्लाना भूलकर अपनी साड़ी को उससे छुडाने मे लग गयी लेकीन उसने अपने दम पर मेरी साड़ी को मेरे बदन से अलग कर दीया. अब मैन अपने पेतीकोअत और ब्लौस मे उसके सामने रोते हुये खडी थी. अपने हाथो को अपने सीने से लगा कर रखा था लेकीन थानेदार ने मेरे एक हाथ को पकड़कर उल्टा मोड़ दीया तोः दरद के मारे अपने दुसरे हाथ से उसको छुडाने लगी. इस्सका फायदा उठाते हुये उसने मेरे ब्लौसे के सामने के सारे हूक झटक कर तोड़ दीये. अब मेरा ब्लौसे एक-दो हूक के सहारे झूल रहा था.

अपने दुसरे हाथ से जब ब्लौस को बचने गयी तोः बेदरद थानेदार ने मेरे पहले वाले हाथ को और जोर से मोड़ दीया. मैन दर्द से कराह उठी और ब्लौस क छोड़ अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश करने लगी. इस्सी तरह करते हुये उसने मेरा ब्लौस और मेरी चोली दोनो को मेरे बदन से जुदा कर दीया. अब मैन अपने दोनो हाथों से अपने दोनो मुम्मो को छुपाते हुये इधर से उधर दौड़ने लगी. लेकीन थानेदार हँसता हुवा मेरे पीछे-पीछे भागता हुवा कीसी भी तरह से हाथ को छुदाता और मेरे मुम्मो को मसल देता. मैन चीख कर दया की बीख माँग कर अपने को बचाती और भागती. ऐसे में थानेदार को मज़ा आ रहा था और मैन रोती हूई इधर-उधर भाग रही थी.

थोड़ी देर खेल ऐसे ही चलता रहा. फीर थानेदार ने मुझे छोड़ मेरे जमीन पर पडे ब्लौस और चोली को उठा कर उन्हें सुन्घ्ता हुवा अपनी डेस्क पर गया और पैग बनाकर और दारु पीने लगा. फीर कुछ रूक कर मुझसे पूछा, “तू भी पीयेगी?”

Pages: 1 2 3

Comments 1

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *