हसीन जवानी में हवस का मज़ा

मैं उन दिनों अपने चाचा जान के यहाँ वाराणसी आई हुई थी। उनके लड़का अब्दुल बड़ा ही खूबसूरत था। गोरा चिट्टा, दुबला सा, लम्बा सा, उसे देखते ही मेरा दिल उस पर आ गया था।

यूँ तो कानपुर में मुझे चोदने वाले कम नहीं थे, पर उनमें ज्यादातर तो गाण्ड मारने के शौकीन थे। गाण्ड मरवाने में मुझे अच्छा तो लगता था पर असल में तो चूत चुद जाये उसका तो कोई मुकाबला ही नहीं है ना।

अब्दुल को देख कर मुझे उससे चुदवाने की इच्छा बलवती होने लगी। अब्दुल भी मेरी हसीन जवानी पर फ़िदा तो था, पर रिश्ते में उसकी बहन जो लगती थी मैं !!!

उसे यह पता नहीं था कि कानपुर में तो कोई यह रिश्ता रखता ही नहीं था। उसे यह बात बताना जरूरी था वरना तो मुझे देख कर बस मुठ ही मार कर रह जायेगा। रात को मैं बिस्तर के अन्दर ही घुस कर उसके नाम की अंगुली चूत में घुसा कर पानी निकाल देती थी।

कहावत है ना, दिल को दिल से राहत होती है, यह बात हम में ज्यादा दिनों तक अन्दर नहीं रह पाई। एक दूसरे की नजरें आपस में लड़ती और दिल का फ़ूल खिल उठता था। नजरें आपस में आपस में सब कुछ कह जाती थी, पर दिल तड़प कर रह जाते थे।

मैं जान बूझ कर के कसी जीन्स और तंग और चिपका हुआ बनियान-नुमा टॉप सिर्फ़ उसके लिये ही पहनती थी, इसमें मेरे जिस्म की सारी गोलाईयाँ उभर कर सामने दिखने लग जाती थी। मेरी मस्त चूंचिया देख कर तो वो अपनी नजरें हटा ही नहीं पाता था। अब मैं हिम्मत करके उसे देख कर मतलब से मुसकराया करती थी।

उस बेचारे को यह नहीं पता था कि मैं उसे सिर्फ़ अपनी वासना शान्त करने के लिये काम में लाना चाहती हूँ, एक नया जिस्म, एक नया मस्त कड़क लण्ड, नई जवानी, नया अनुभव, नया सुख, नई मस्ती…. सभी को यही तो चाहिये ना।

एक दिन शाम को सभी घर वाले शादी के खाने पर गए हुए थे। मैंने सोचा- खाने का समय नौ बजे का होता है तो मैं देरी से चली जाऊंगी। पर वहाँ पर घर वालों का कार्यक्रम बदल गया, वो लोग जल्दी खाना खाने के बाद दूसरी शादी में भी हाजिरी देना चाह रहे थे। उन्होने अब्दुल को मुझे लेने घर भेज दिया।

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मैं उस समय अकेलेपन का फ़ायदा उठा कर कम्प्यूटर Rangeen Kahaniyaaan पढ़ रही थी। किसी को आया देख कर मैंने कम्प्यूटर बन्द कर दिया और बाहर आ गई। अकेले अब्दुल को देख कर मैं चौंक गई। मन में सोचा कि शायद इसको मेरे अकेले होने का फ़ायदा उठाना है, इसलिये इसने मौका देख कर इधर आया है। मैं भी इस मौके को नहीं जाने देना चाह रही थी। मैं दिल ही दिल में इसके लिये मैं अपने आप को तैयार करने लगी।

मैं ढीला ढाला पुराना सा कुरता पहने थी और अच्छी भी नहीं लग रही थी, मुझे अपने आप पर बहुत खीज आई।

“अरे ! ऐसे ही हो अब तक, तैयार तो हो लो, जल्दी चलना है।” उसने मेरे जिस्म को ऊपर से नाचे तक देखा।

“हां, अन्दर आ जाओ, अभी तैयार हो जाती हूँ !” मैं उसे मतलब से घूरने लगी।
“मैं कुछ मदद करूं क्या, कुछ लाना हो तो ?”
“बस दरवाजा बन्द कर दो…. और कुछ नहीं !” उसने दरवाजा अन्दर से बन्द कर दिया।
“बस, ठीक है ना…. सुनो बानो, नाराज नहीं हो तो एक बात कहूं ?” उसने हिम्मत दिखाई और मेरा दिल धक धक करने लगा।
“अरे कहो ना, भाई हो, शरमाते क्यूँ हो ?” भाई का शब्द सुनते ही उसका सारा जोश ठण्डा पड़ गया।
“नहीं बस यूँ ही, कुछ नहीं !” उसका प्यारा सा मुखड़ा लटक गया।
“अच्छा भाई नहीं दोस्त हो बस, अब कहो….”
“मैं चाहता हूँ कि बस एक बार …. बस एक बार…. मेरे गाल पर प्यार कर लो !”
“बस इतनी सी बात …?”
मुझे लगा मौका है, बात आगे बढ़ा लो ….
मैं उसके पास गई, और उसके गाल पर एक गहरा सा चुम्मा ले लिया।
“थेंक्स…. अच्छा लगा !”
“बस एक ही….एक दो बार और कर दूँ ….” मैंने एक किस गाल पर और दूसरा होंठ पर कर दिया। इतना उसे भड़काने के लिये बहुत था।
“मुझे भी करने दो ना सिर्फ़ एक बार !” मैंने अपनी आंखे बन्द कर दी और चेहरा ऊपर कर दिया।
उसने धीरे से मेरे निचले होंठ दबा कर चूस लिये और उसके हाथ मेरी कमर पर कस गए।
उसका लम्बा किस खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था। मेरे मन की कली खिल उठी। मैंने सोचा कि ये तो गया काम से, चक्कर में आ ही गया। हो सकता है शायद वो यह सोच रहा हो कि उसने मैदान मार लिया।
“अब्दुल, बस कर न, कोई आ जायेगा….हाय अब्बा…. चल छोड़ दे अब !”
“बानो, बस थोड़ा सा और…. ! ऐसा मौका फिर नहीं मिलेगा ना, सब घर में रहते हैं और आप ऊपर मेरे कमरे में आती ही नहीं हैं !”
“हायऽऽ बसऽऽ मेरे अरमान जाग जायेंगे, अब्दुल, बस कर !” मैंने उसे और भड़काया।
मेरा मन खुशी के मारे उछल रहा था। उसे छोड़ने का दिल बिल्कुल ही नहीं कर रहा था। हम दोनों प्यार में एक दूसरे से लिपट पड़े। वो मेरे होंठो को बेतहाशा चूमने लग गया था, जैसे सब्र का बांध टूट गया हो। उसका जिस्म मेरे जिस्म से रगड़ खा कर उत्तेजित होने लगा था। जाने कब उसके हाथ मेरे उभरे अंगों तक पहुंच गए और उसे सहलाने और दबाने लगे।
ढीले कुरते का यह फ़ायदा हुआ कि उसके हाथ मेरी नंगी चूंचियों तक सरलता से पहुंच गये और अब मुझे भरपूर मजा दे रहे थे। मेरी चूत गीली हो उठी।
“अब्दुल अब तक तू कहाँ था रे ? मुझसे दूर क्यों रहा था? हाय तुझे पा कर मुझे कितना अच्छा लग रहा है ! कब से तो मैं तुझे लाईन मार रही थी !” मैंने अपनी दिल की बात उससे कह दी।
“मैं भी कबसे आपको प्यार करता हूँ…. मैंने भी तो कितनी बार आपको देखा, पर हिम्मत नहीं होती थी, …. बानो सच तुम मेरी हो, मुझे यकीन ही नहीं हो रहा है !”
“हाय अब्दुल, सच में मुझे प्यार करोगे…. करो ना…. मेरे दिल की हसरत निकाल दो, प्लीज !” मुझे लग रहा था कि शादी वादी की ऐसी की तैसी, अभी टांगे चौड़ी करके उसका लण्ड घुसा लूँ।
“देर हो जायेगी बानो, रात को आ जाना ऊपर मेरे कमरे में…. मुझे भी अपनी दिल की हसरतें पूरी करनी हैं !”
“मेरे अब्दुल…. !” और एक बार फिर से हम लिपट कर चुम्मा चाटी करने लगे।
उसके लण्ड का भी बुरा हाल था और मेरी चूत तो पानी टपकाने लगी थी। प्यार और वासना की एक मिली जुली आग लगी हुई थी, जिस्म मीठी आग में झुलसने लगा था। लग रहा था कि अभी चुदवा कर सारा पानी निकाल दूँ पर मेरे रब्बा ….हाय…. अभी इस आग में मुझे थोड़ी देर और जलना था।

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