घरवाली और पड़ोस वाली डबल मज़ा भाग 3

उन्हें स्पीकर पर दरवाजा खुलने की आवाज आई और फिर गौरव और कविता के परों की आहट सुनाई पडी. साड़ी चीजें बिलकुल साफ़ सुनाई पड़ रही थीं. उन्होंने क्लिक की आवाज सुनी, लगता है गौरव ने दरवाजा लॉक कर लिया हो. कविता मुंह दबा कर हंस रही थी. उसकी दिल की धडकनें जोर से चल रही थीं. गौरव ने लाइट ऑफ कर के वहां अँधेरा कर दिया. कविता ने जोर से सांस भरी और उई की अव्वाज निकाली क्योंकि गौरव अपना हाथ उसकी स्कर्ट के अन्दर डाल कर उसकी चूत सहला रहा था. कविता ने अपने पैरों को फैला दिया ताकि गौरव उसकी चूत को मजे से सहला सके और बोली,
“मौका मिला की की दरवाजा बंद और बत्ती बंद और काम चालू गौरव जी?”

“अरे मै तो तुम्हारे लिये कब से कितना बेकरार हूँ, बस मौका मिलने की ही देर थी जानेमन.”

“ओह नो …. ओह… नो ….. बड़ा मजा आ रहा है, तुम जिस तरह से मेरी स्कर्ट के अन्दर मेरी रगड़ रहे हो…. ओह गौरव … तुम तो बड़े खिलाडी निकले..आह्ह…”

“आओ यहाँ इस काउंटर पर बैठो, ताकि मैं तुम्हारी बुर चाट सकूं कविता.”

बाहर विवेक और रेनू स्पीकर पर चलने की आवाज फिर गीली चीज चाटने की आवाज और साथ में कविता के सिहरने की आवाज सुन रहे थे.

“ऊ ऊ ऊ ऊ ऊ… यस गौरव… बहुत अच्छे … कितना मजा आ रहा है….. ओह शिट गौरव लगता है की झड जाऊंगी… फक…….”

भरी साँसों के आवाजों से सारा कमरा भर उठा. थोडी समय बाद कविता एक धीमी से चीख मार कर शांत हो गयी. कविता बोली,
“अब कुछ खाने का मेरा टर्न गौरव…. चलो खोलो और दिखाओ यहाँ क्या छुपा रखा है …”

और इसके बाद स्पीकर पर गौरव के लंड के ऊपर कविता का गीले मुंह की आवाजें सुनाई दीं. गौरव को मजा लेने की आवाजें भी बीच में आ रही थीं.

और कुछ ही छड़ों बाद

“मैं तुम्हारी बुर चोदना चाहता हूँ कविता… अभी के अभी…”

“यस …. जल्दी से…. ओह यस …मजा आ रहा है ….. सो गुड. ओह तुम्हारा बड़ा लंड बड़ा प्यारा है गौरव… पेल दो इसे …. छोड़ दो मुझे…मुझे चोदो……. फक…फक…”

थोड़ी देर में जब आवाजें आनी बंद हो गयीं, गौरव बोला,
“ओह कविता, कपडे वापस पहनने की जरूरत नहीं है. चलो वापस विवेक और रेनू के पास चलते हैं… मुझे पूरा यकीन है की वो दोनों ऐसा की कुछ कर रहे होंगे”

“मुझे भी ऐसा जी लगता है”

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जब गौरव और कविता नंगे बदन वापस विवेक और रेनू के वापस आये, रेनू फर्श पर फैले कालीन पर पूरी तरह से नंगी लेटी हुई थी. उसने अपने पैर पूरी तरह से फैला रखे थे. विवेक उसकी दोनों लम्बी और सुन्दर टांगों के बीच में बैठा उसकी चूत को अपने मोटे लंड से धीरे धीरे धक्के लगाता हुआ छोड़ रहा था. दोनों काफी आवाजें निकाल रहे थे. कविता ने विवेक को दूसरी औरत को चोदते हुए कभी नहीं देखा था. ये नज़ारा देख कर उसके बदन में जैसे ऊपर से नीचे तक चीटियाँ रेंग गयीं और उसकी चूत फिर से चुदाई के लिए बिलकुल तैयार हो गयी.
गौरव को तो बस इशारा ही काफी था. उसने खड़े खड़े ही पीछे से अपना लंड कविता की बुर में डाल दिया और उसे तब तक चोदा जब तक दोनों झड नहीं गए.

सबने बाद में बैठ कर बड़े ही आराम से डिनर खाया. खाने की टेबल पर बैठ कर उन्होंने खूब सारी बातें की. ध्यान देने वाली बात ये थी की सारी की सारी बातें सेक्स से ही सम्बंधित थीं और चारों लोग डिनर टेबल पर पूरी तरह से नंगे बैठ कर खाना खा रहे थे. खाना ख़तम कर के जब वे वापस उस कमरे में लौटे तो रेनू कविता के साथ चल रही थी. रेनू ने कविता की नंगी कमर को अपने हाथो में भर कर पूछा,
“तुमने कभी किसी औरत के साथ सेक्स किया है कविता?”

“अभी तक तो नहीं … पर ऐसा लगता है की आज इस चीज पर भी हाथ साफ कर ही डालूँ..पर मुझे पता नहीं है की कैसे करते हैं…”

“अरे कभी न कभी तो जब आदमी के साथ किया होगा तो पहली बार ही हुआ होगा न? करना चालू करो तो बाकी सब अपने आप हो जाएगा..देखो, पहले मैं तुमारी बुर चाटना शुरू करती हूँ…उसके बाद तुम जैसा मैं तुम्हारे साथ करू वो तुम्हें अगर तुम्हें ठीक लगे तो मेरे साथ करते जाना.. बस मजा आना चाहिए..”

विवेक और गौरव दोनों लोग अपने हाथ में स्कॉच का जाम ले कर बैठ गए. ऐसा लग रहा था की जैसे लड़के लोग नाईट क्लब में बैठ कर दारू पीते हुए कोई शो देख रहे हों. रेनू ने कविता को सोफे के इनारे पर बिठा कर लिटा दिया और अपने तजुर्बेकार मुंह से कविता की बुर को चाटने लगी. रेनू की जीभ कविता की बुर के बाहर की खल के ऊपर थिरकती और दुसरे ही पल वह उसके बुर के दाने को चाट लेती, अगले पल वह कविता की बुर के छेद में अपनी जीभ घुसेड कर जैसे उसे थोडा सा अपनी जीभ से छोड़ सा देती थी. कविता उन्माद में सिस्कारिया भर रही थी. रेनू धीरे धीरे बुर के दोनों तरफ की खाल चाट रही थी और उसने अपने एक उंगली कविता की बुर में डाल राखी थी और दूसरी उंगली उसके गांड में. कविता के लिए यह अनुभव एकदम नया था और वो इसे जी भर के मजे ले कर ले रही थी. कविता अपना बदन एक नागिन की तरह उन्माद में घुमा रही थी. वो उन्माद में चीख रही थी. इतना आनंद उसके बाद के बाहर हो गया और एक चीत्कार के साथ ही उसने रेनू की जीभ पर अपनी बुर का रस उड़ेल दिया. कविता का बदन शिथिल पद गया. वह रेनू के कन्धों पर अपने पर डाले हुए सोफे पर टाँगे फैला कर नंगे पडी हुई थी.

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कविता ने लेटे लेटे अपनी बुर की तरफ देखा. रेनू ने अपना चेहरा उसकी दोनों टांगों के बीच से ऊपर उठा. दोनों एक दुसरे को देख कर मुस्काये. कविता उठी और रेनू को पकड़ कर उसके होठों से होठों का चुम्बन दिया. कविता ने रेनू के होठों पर लगा हुआ अपनी ही बुर का रस चाट चाट कर स्सफ कर दिया.

“ये तो वाकई बड़ा मजे वाला था रेनू… थैंक यू डार्लिंग. मुझे लगता है की मुझे भी बदले में कुछ करना चाहिए”

कविता रेनू को लिटा कर उसके ऊपर 69 का पोज बना कर लेट गयी. दोनों लड़कियां एक दुसरे की चूत मस्त हो कर चाट रहीं थीं.

गौरव के पास क्यूबा से लाये हुए सिगार थे. उसने एक गौरव को दिया और एक खुद के लिए रखा. दोनों लड़कियों के पास गए. गौरव ने रेनू की चूत में लगभग 2 इंच सिगार घुसेढ़ दिया. विवेक ने भी इसकी पूरी नक़ल करते हुए कविता की बुर में सिगार दाल दिया.
रेनू बोली, “क्या तुम लोगों के लंड अब इतना थक गए हैं की हम लोगों को अब सिगार से चुदना पड़ेगा”

“अरे नहीं मेरी जान, ये तो हम तुम्हें चोदने के पहले तुम्हारी चूतों को थोडा धूम्रपान करा रहे हैं” कहते हुए गौरव ने सिगार दुसरे सिरे से जलाने की कोशिश की. पर वो जला नहीं क्योंकि सिगार को फूंकने की जरूरत होती है. और रेनू की चूत में शायद फूंकने का हुनर नहीं था.

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