फूफी फरहीन के साथ कमुक्त भाग 5

में उनके ऊपर से उतार गया और उन्हे गले से लगा कर खूब चूमा.
“फूफी फ़रहीन आप का बदन ही ऐसा है के में आप को चोदे बगैर नही रह सकता. आप जानती हैं के हमारे पास टाइम भी थोड़ा है. लेकिन आप के जिसम दर्द आयी और फुद्दी भी दुख रही है. मै आप को तक़लीफ़ में भी नही देख सकता.” मैंने बात शुरू की. उन्होने अपनी क़मीज़ का दामन अपनी फुद्दी के सामने किया और मेरी बात सुन ने लगीं.
“में ये भी जानता हूँ के आज की चुदाई से आप को तक़लीफ़ हुई है और इस वक़्त आप दोबारा मुझे फुद्दी नही दे सकतीं. मगर प्लीज़ आप भी मेरा कुछ ख़याल करें मेरा लंड खड़ा है और में डिसचार्ज ना हुआ तो रात गुज़ारनी मुश्किल हो जाए गी.” मैंने अपनी मजबूरी बयान की.

“अमजद में आज तो कम-आज़-कम तुम्हे चूत नही दे सकती सारी सूजी हुई है.” उन्होने ज़रा हंदर्दाना लहजे में अपनी चूत की तरफ देख कर जवाब दिया.
“फूफी फ़रहीन में भी किया करूँ. आप के मम्मे, आप की चूत और आप की गांड़ ने मुझे पागल कर रखा है. मै आप को चाहे जितना मर्ज़ी चोद लूं मेरा दिल नही भरता.” मैंने उनके गोरे और गुन्दाज़ बाज़ू पर हाथ फेरते हुए जज़्बात से भरी हुई आवाज़ में कहा. जब उन्होने ये सुना तो उनके चेहरे पर खुशी की हल्की सी लहर दौड़ गई.
“तो कल सुबह तक सबर कर लो ना.” उन्होने अपनी बात दुहरई.
“मगर इस वक़्त किया करें?” मैंने फिर सवाल किया.
“अच्छा आओ में तुम्हारा लौड़ा चूस कर तुम्हे डिसचार्ज कर देती हूँ. अगले हफ्ते तुम लाहोर आ जाना वहीं पर जो करना हो कर लाना.” उन्होने दरमियानी रास्ता निकालने की कोशिश की.
“फूफी फ़रहीन चॅपलेन में आज आप की फुद्दी नही मारता मगर इस के बदले में आप को कुछ और करना पड़े गा.” मैंने उनकी आँखों में देखा.
“वो किया?” उन्होने पूछा.
“अगर आप को कोई ऐतराज़ ना हो तो में आज आपकी गांड़ मार लूं और यों मेरा काम भी हो जाए गा और आप को भी तक़लीफ़ नही हो गी.” में मतलब की बात ज़बान पर ले आया.
वो हैरात्ज़ादा रह गईं और तेज़ी से नफी में सर हिलाने लगीं.

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“नही नही अमजद गांड़ देना बहुत बड़ा गुनाह है और मैंने कभी भी गांड़ में लौड़ा नही लिया. तुम्हारा तो लौड़ा भी बहुत मोटा है मेरी तो गांड़ फॅट जाए गी. वो सुराख इस काम के लिये तो नही बना. वैसे भी ये वक़्त गांड़ देने का नही है.”
“फूफी फ़रहीन आप प्लीज़ बस एक दफ़ा मुझे अपनी गांड़ लेने दें. प्लीज़ किया आप मेरी अच्छी फूफी नही हैं.” मैंने इल्तिज़ा-आमीज़ लहजे में उनके गालों को हाथ लग्गाते हुए कहा.
“में बिल्कुल तुम्हारी फूफी हूँ लेकिन जो तुम चाहते हो वो मुझ से कभी नही हो सकेगा. फिर इस की आख़िर ज़रूरत भी किया है. चूत तो दे रही हूँ ना तुम्हे.” उन्होने कहा.
“लेकिन मुझे आप की गांड़ मारने का बहुत शोक़् है फूफी फ़रहीन.” मैंने इसरार किया.
“ये किस क़िसम का शोक़् है जिस में औरत की जान ही निकल जाए. चूत देते हुए अच्छी ख़ासी तकलीफ़ होती है तो गांड़ देते हुए किया हाल होगा.” वो सर हिला कर बोलीं.
“में आप को यक़ीन दिलाता हूँ के आप को तकलीफ़ बिल्कुल नही हो गी.” मैंने बड़ी संजीदगी से कहा.
“कैसे नही हो गी. मेरी गांड़ में आख़िर तुम्हारा इतना मोटा लौड़ा जाए गा कैसे.” उन्होने हाथ से इशारा कर के बताया.
“टेल लगा कर में अपना लंड आसानी से आप की गांड़ में ले जा सकता हूँ. आप राज़ी तो हूँ. बिल्कुल थोड़ी तकलीफ़ हो गी.” मैंने उन्हे का’आइल करने की कोशिश जारी रखी.
“देखो में तुम्हे गांड़ कैसे दे दूँ. मुझे सलीम के अलावा और किसी ने हाथ नही लगाया. तुम दूसरे मर्द हो जिस ने मेरी चूत ली है. सलीम ने तो पिछले 21 साल में कभी मेरी गांड़ को उंगली तक नही लगाई. मुझे गांड़ देने का कुछ पता ही नही है. मै ये नही कर सकती.” उन्होने कहा.

मैंने मज़ीद बहस नही की और उनके नंगे चूतड़ों के नीचे हाथ घुसा कर उनकी गांड़ के सुराख तक पुहँछने की कोशिश की लेकिन उन्होने अपनी गांड़ पर सारे जिसम का वज़न डाल दिया और और मेरे हाथ को अपने चूतड़ों के नीचे अपने छेद तक जाने का मोक़ा नही दिया. मेरा हाथ उनके भारी और मोटे चूतड़ों के नीचे दब गया.
“में गांड़ में तुम्हारा लूआर्रा बर्दाश्त नही कर सकती अमजद में सच कह रही हूँ.” उन्होने मेरे लंड को हाथ में ले कर जैसे टटोलते हुए कहा.

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“में गांड़ में तुम्हारा लूआर्रा बर्दाश्त नही कर सकती अमजद में सच कह रही हूँ.” उन्होने मेरे लंड को हाथ में ले कर जैसे टटोलते हुए कहा.
“बस ठीक है फूफी फ़रहीन में अपने कमरे में जाता हूँ किया फायदा आप की मिनाताईं करने का.” मैंने खफ्गी का इज़हार किया और उनके हाथ से अपना लंड छुड़ा लिया. फूफी फ़रहीन ने जल्दी से मेरा हाथ पकड़ लिया और कहा:
“किया सिर्फ़ यही एक तरीक़ा है तुम्हे डिसचार्ज करने का?”
“हन बस यही एक तरीक़ा है.” मैंने उसी खफा लहजे में जवाब दिया.

में उनकी मजबूरी समझ रहा था. वो मुझे गांड़ देने की तक़लीफ़ के बदले अपनी चूत मरवाने के मज़े को नही गँवाना चाहती थीं और इसी लिये अब गांड़ देने पर राज़ी हो रही थीं . वो कुछ सोचने लगीं.
“अच्छा चलो तुम मेरी गांड़ ले लो मगर पहले ये वादा करो के तुम मेरी गांड़ बहुत आराम से मारो गे और मुझे दुखाओ गे नही.” उन्होने दोबारा मेरा लंड हाथ में लेते हुए मुझ से गॅरेंटी चाही.
“बिल्कुल वादा है मैरा. अगर आप को ज़ियादा तक़लीफ़ हुई तो में आप की गांड़ नही मारूं गा.” मैंने कहा और उनकी क़मीज़ और ब्रा उतार कर साइड टेबल पर पडा हुआ लॅंप जला दिया ताके में उनकी गांड़ मारते हुए उनके दूधिया बदन को साफ़ तौर पर देख सकूँ.

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