बहू के मज़े ससुर ले रहा है

” अरे बेटी इसमें इज़ाज़त की क्या बात है? तुम्हारे ही खेत हैं जुब चाहो चली जाओ. मैं अभी तुम्हारे ससुर जी से कहती हूँ तुम्हें खेत दिखाने ले जाएँ.”
” नहीं नहीं मम्मी जी आप पिताजी को क्यों परेशान करती हैं मैं अकेली ही चली जवँगी.”
” इसमे परेशान करने की क्या बात है? काई दिन से ये भी खेत नहीं गये हैं तुझे भी साथ ले जाएँगे. जाओ तुम तयार हो जाओ. और हन लहंगा चोली पहन लेना, खेतों में जाने के लिए वही ठीक रहता है.” कंचन तयार होने गयी. माया देवी ने रामलाल को कहा,
” अजी सुनते हो, आज बहू को खेत दिखा लाओ. कह रही थी मैं अकेली ही चली जाती हूँ. मैने ही उसको रोका और कहा ससुरजी तुझे ले जाएँगे.”
” ठीक है मैं ले जवँगा, लेकिन अकेली भी चली जाती तो क्या हो जाता ? गाओं में किस बात का दर्र?””
” कैसी बातें करते हो जी? जवान बहू को अकेले भेजना चाहते हो. अभी नादान है. अपनी जवानी तो उससे संभाली नहीं जाती, अपने आप को क्या संभालेगी? ” इतने में कंचन आ गयी. लहंगा चोली में बाला की खूबसूरत लग रही थी.
” चलिए पिताजी मैं टायर हूँ.”
” चलो बहू हम भी टायर हैं.” ससुर और बहू दोनों खेत की ओर निकल परे. कंचन आयेज आयेज चल रही थी और रामलाल उसके पीच्चे. कंचन ने घूँघट निकाल रखा था. रामलाल बहू की मस्तानी चाल देख कर पागल हुआ जेया रहा था. बहू की पतली गोरी कमर बाल खा रही थी. उसके नीचे फैले हुए मोटे मोटे छूटेर चलते वक़्त ऊपेर नीचे हो रहे थे. लहंगा घुटनों से तोरा ही नीचे था. बहू की गोरी गोरी टाँगें और छूटरों तक लटकते लूंबे घने काले बाल रामलाल की दिल की धड़कन बरहा रहे थे. ऐसा नज़ारा तो रामलाल को ज़िंदगी में पहले कभी नसीब नहीं हुआ. रामलाल की नज़रें बहू के मटकते हुए मोटे मोटे छूटरों और पतली बाल खाती कमर पर ही टिकी हुई थी. उन जान लेवा छूटरों को मटकते देख कर रामलाल की आँखों
के सामने उस दिन का ंज़ारा घूम गया जिस दिन उसने बहू के छूटरों के बीच उसके पेटिकोट और कच्ची को फँसे हुए देखा था. रामलाल का लॉडा खड़ा होने लगा. कंचन घूँघट निकाले आयेज आयेज चली जेया रही थी. वो अक्च्ची तरह जानती थी की ससुर जी की आँखें उसके मटकते हुए नितुंबों पे लगी हुई हैं. रास्ता सांकरा हो गया था और अब वो दोनो एक पग दांडी पे चल रहे थे. अचानक साइड की पग दांडी से दो गढ़े कंचन के सामने आ गये. रास्ता इतना कूम शॉरा था की साइड से आयेज निकलना भी मुश्किल था. मजबूरन कंचन को गधों के पीच्चे पीच्चे चलना परा. अचानक कंचन का ध्यान पीच्चे वाले गढ़े पे गया.
“ अरे पिताजी देखिए ये कैसा गढ़ा है ? इसकी तो पाँच टाँगें हैं.” कंचन आयेज चल रहे गढ़े की ओर इशारा करते हुए बोली.
” बेटी, तुम तो बहुत भोली हो, ज़रा ध्यान से देखो इसकी पाँच टाँगें नहीं हैं.”
कंचन ने फिर द्‍यान से देखा तो उसका कलेजा धक सा रह गया. गढ़े की पाँच टाँगें नहीं थी, वो तो गढ़े का लंड था. बाप रे क्या लूंबा लंड था ! ऐसा लग रहा था जैसे उसकी टाँग हो. कंचन ने ये भी नोटीस किया की आयेज वाला गढ़ा, गढ़ा नहीं बल्कि गढ़ी थी क्योंकि उसका लंड नहीं था. गढ़े का लंड खरा हुआ था. कंचन समझ गयी की गढ़ा क्या करने वाला था. अब तो कंचन के पसीने छ्छूट गये. पीच्चे पीच्चे ससुर जी चल रहे थे. कंचन अपने आप को कोसने लगी की ससुर जी से क्या सवाल पूच लिया. कंचन का शरम के मारे बुरा हाल था.

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रामलाल को अक्च्छा मोका मिल गया था. उसने फिर से कहा,
” बोलो, बहू हैं क्या इसकी पाँच टाँगें ?” कंचन का मुँह शरम
से लाल हो गया, और हकलाती हुई बोली,
“ ज्ज…जी चार ही हैं.”
“ तो वो पाँचवी चीज़ क्या है बहू?”
” ज्ज्ज….जी वो तो ……..जी हुमें नहीं पता.”
„ पहले कभी देखा नहीं बेटी ?“ रामलाल मज़े लेता हुआ बोला.
” नहीं पिताजी.” कंचन शरमाते हुए बोली.
” मर्दों की टाँगों के बीच में जो होता है वो तो देखा है ना?”
” जी..” अब तो कंचन का मुँह लाल हो गया.
” अरे बहू जो चीज़ मर्दों के टाँगों के बीच में होती है ये वही
चीज़ तो है.” रामलाल कंचन के साथ इस तरह की बातें कर ही रहा
था की वही हुआ जो कंचन मून ही मून माना रही थी की ना हो. गढ़ा
अचानक गढ़ी पे छरह गया और उसने अपना टीन फुट लूंबा लंड गढ़ी
की छूट में पेल दिया. गढ़ा वहीं खरा हो कर गढ़ी के अंडर अपना
लंड पेलने लगा. इतना लूंबा लंड गढ़ी की छूट में जाता देख
कंचन हार्बारा कर रुक गयी और उसके मुँह से चीख निकल गयी,
” ऊओिइ माआ…..”
” क्या हुआ बहू ?”
” ज्ज्ज…जी कुच्छ नहीं.” कंचन घबराते हुए बोली.
” लगता है हुमारी बहू दर्र गयी.” रामलाल मौके का पूरा फ़ायदा उठता हुआ डारी हुई कंचन का साहस बरहाने के बहाने उसकी पीठ पे हाथ रखता हुआ बोला.
” जी पिताजी.”
” क्यों डरने की क्या बात है ?”
” वैसे ही.”
” वैसे ही क्या मतलब ? कोई तो बात ज़रूर है. पहली बार देख रही हो ना?” रामलाल कंचन की पीठ सहलाता हुआ बोला.
” जी.” कंचन शरमाते हुए बोली.
” अरे इसमें शरमाने की क्या बात है बहू. जो राकेश तुम्हारे साथ हेर रात करता है वही ये गढ़ा भी गढ़ी के साथ कर रहा है.”
” लेकिन इसका तो इतना..…….” कंचन के मुँह से अनायास ही निकल गया और फिर वो पकचछटायी..
” बहुत बरा है बहू?” रामलाल कंचन की बात पूरी करता हुआ बोला.
अब रामलाल का हाथ फिसल कर कंचन के नितुंबों पे आ गया था.
” ज्जजी…..” कंचन सिर नीचे किए हुए बोली.
“ ओ ! तो इसका इतना बरा देख के दर्र गयी ? कुच्छ मर्दों का भी गढ़े
जैसा ही होता है बहू. इसमें डरने की क्या बात है ?. जुब औरत बारे
से बरा झेल लेती है, फिर ये तो गढ़ी है.”
कंचन का चेहरा शरम से लाल हो गया था. वो बोली,
” चलिए पिताजी वापस चलते हैं, हुमें बहुत शरम आ रही है.”
” क्यों बहू वापस जाने की क्या बात है? तुम तो बहुत शरमाती हो. बस दो मिनिट में इस गढ़े का काम ख़तम हो जाएगा फिर खेत में चॅलेंज.” बातों बातों में रामलाल एक दो बार कंचन के नितुंबों पे हाथ भी फेर चक्का था. रामलाल का लंड कंचन के मुलायम नितुंबों पर हाथ फेर के खड़ा होने लगा था. वो कंचन की पनटी भी फील कर रहा था. कंचन क्या करती ? घूँघट में से गढ़े को अपना लंड गढ़ी के अंडर पेलते हुए देखती रही. इतना लूंबा लंड गढ़ी के अंडर बाहर जाता देख उसकी छूट पे भी चीतियाँ रेंगने लगी थी.

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