१८ साल की पंजाबी चुत को बजाय

दोस्तों मै मस्ताराम का एक पाठक हु खाली टाइम में ऑफिस में बैठ कर कहानिया लिखता रहता हूँ वैसे आज एक मजेदार बात बता रहा हूँ | मेरा यह मानना है कि दारु और चूत कभी भी झूठी नहीं होती – जब भी मौका मिले, इनसे मजे लेने चाहिए। चूत खूब चोदिये मगर गांड मारना न भूलें। और जब गांड मारें तो अपना रायता उसी के अन्दर छोड़ दें ताकि उस लौंडियाँ की गांड में एक गर्म एहसास रह जाए।
मैं चादपुर का रहने वाला हूँ। मेरे घर के पास एक परिवार है बेटा जिसका नाम विशु है, मेरा बहुत अच्छा दोस्त है – और छोटी बेटी जिसका नाम कव्या है – उसके तो क्या कहने। मुझसे सिर्फ दो साल छोटी है।
मैं विशु के घर बहुत जाता था। विशु से मिलने और फिर कव्या को छूने। विशु और मैं एक ही क्लास में पढ़ते थे। हम दोनों पढ़ाई भी साथ करते थे और लौंडिया-बाज़ी भी साथ ही करते थे। उसको शायद लगता था कि मैं उसकी बहन के चक्कर में उसके घर आता-जाता हूँ। एक दो बार उसने मुझे कव्या को हसरत भरी नज़रों से देखते हुए पकड़ा भी था। एक दिन उसने मुझसे कहा भी था कि मैं अपनी औकात में रहूँ। हर भाई अपनी बहन को शायद इसी तरह सुरक्षित रखना चाहता है।
अब विशु के चाहने से भला क्या होगा। कव्या को मेरा उसे छूना शायद अच्छा लगता था तभी वो मेरे करीब आकर बैठती थी।
उस वक़्त मैं बीस साल का था और कव्या अट्ठारह साल की थी। कव्या एक पंजाबी परिवार से थी। काफी गोरी-चिट्टी और हर जगह से उसका बदन फूट फूट के उभार मार रहा था। बहुत ही चिकनी थी वो। उसकी बाहों पर या टांगों पर बिल्कुल भी बाल नहीं थे। हाँ – बहुत पास से उनमे रोम ज़रूर दीखते थे। मेरी बस एक ही तमन्ना थी कि गुलाब जामुन का शीरा उसके नंगे जिस्म पर डालूँ और ऊपर से नीचे तक उसे चाटूं। यह सोचकर ही मेरा खड़ा होने लगता था और मैं मुठ मारता था। मैं एक मौके की ताक में था कि कब हम अकेले मिलें।
पंजाबियों की दाद देनी पड़ेगी- क्या खाकर ये लोग इतनी सुन्दर और मस्त लौंडियाँ पैदा करते हैं। साला देखते ही लंड खड़ा होने लग जाता है। खैर, रब ने एक दिन मेरी सुन ली।
कव्या मेरे घर आई थी। उसने मेरी माँ से थोड़ी देर बातचीत की और जाने लगी। मैं उसको दरवाजे तक छोड़ने आया और उसको जोर से अपने गले लगा लिया। यह पहली बार था कि मैं उससे लिपट रहा था।

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मेरा यह मानना है कि दारु और चूत कभी भी झूटी नहीं होती – जब भी मौका मिले, इनसे मजे लेने चाहिए। चूत खूब चोदिये मगर गांड मारना न भूलें। और जब गांड मारें तो अपना रायता उसी के अन्दर छोड़ दें ताकि उस लौंडियाँ की गांड में एक गर्म एहसास रह जाए।
मैं चादपुर का रहने वाला हूँ। मेरे घर के पास एक परिवार है बेटा जिसका नाम विशु है, मेरा बहुत अच्छा दोस्त है – और छोटी बेटी जिसका नाम कव्या है – उसके तो क्या कहने। मुझसे सिर्फ दो साल छोटी है।
मैं विशु के घर बहुत जाता था। विशु से मिलने और फिर कव्या को छूने। विशु और मैं एक ही क्लास में पढ़ते थे। हम दोनों पढ़ाई भी साथ करते थे और लौंडिया-बाज़ी भी साथ ही करते थे। उसको शायद लगता था कि मैं उसकी बहन के चक्कर में उसके घर आता-जाता हूँ। एक दो बार उसने मुझे कव्या को हसरत भरी नज़रों से देखते हुए पकड़ा भी था। एक दिन उसने मुझसे कहा भी था कि मैं अपनी औकात में रहूँ। हर भाई अपनी बहन को शायद इसी तरह सुरक्षित रखना चाहता है।
अब विशु के चाहने से भला क्या होगा। कव्या को मेरा उसे छूना शायद अच्छा लगता था तभी वो मेरे करीब आकर बैठती थी।

उस वक़्त मैं बीस साल का था और कव्या अट्ठारह साल की थी। कव्या एक पंजाबी परिवार से थी। काफी गोरी-चिट्टी और हर जगह से उसका बदन फूट फूट के उभार मार रहा था। बहुत ही चिकनी थी वो। उसकी बाहों पर या टांगों पर बिल्कुल भी बाल नहीं थे। हाँ – बहुत पास से उनमे रोम ज़रूर दीखते थे। मेरी बस एक ही तमन्ना थी कि गुलाब जामुन का शीरा उसके नंगे जिस्म पर डालूँ और ऊपर से नीचे तक उसे चाटूं। यह सोचकर ही मेरा खड़ा होने लगता था और मैं मुठ मारता था। मैं एक मौके की ताक में था कि कब हम अकेले मिलें।
पंजाबियों की दाद देनी पड़ेगी- क्या खाकर ये लोग इतनी सुन्दर और मस्त लौंडियाँ पैदा करते हैं। साला देखते ही लंड खड़ा होने लग जाता है। खैर, रब ने एक दिन मेरी सुन ली।
कव्या मेरे घर आई थी। उसने मेरी माँ से थोड़ी देर बातचीत की और जाने लगी। मैं उसको दरवाजे तक छोड़ने आया और उसको जोर से अपने गले लगा लिया। यह पहली बार था कि मैं उससे लिपट रहा था।

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तो मैंने अपने दूसरे हाथ से उसकी जाँघों का मुआयना किया। क्या सुडौल जांघें थी। धीरे-धीरे मेरा हाथ उसकी चूत पर पहुँचा। शायद उसे भी यही चाहिए था। मैं उसकी चूत पर अपना हाथ फेरता रहा – कभी सहलाता और कभी उसे नोचता था। पायजामे के ऊपर से ही मैं उसकी चूत को रगड़ता रहा। उसके मुँह से सिर्फ ऊह-आह की ही आवाज आ रही थी।

बगल में एक पलंग था। मैं उस पर बैठ गया और धीरे से कव्या को अपनी गोद में बिठा लिया। फिर मैंने उसकी कुर्ती उतार दी। उसकी बगलों से एक परफ्यूम की खुशबू ने तो जैसे मुझे मदहोश ही कर दिया।
मैंने उसकी बगलों को चूमा तो वो उचक गई, क्या करते हो अज्जू?
कहकर वो मुझसे लिपट गई।
मैंने उसके कन्धों को, गर्दन को और गले को खूब चूमा।
कव्या बोली- हे भगवान ! अज्जू क्या कर रहे हो। मैं निचुड़ जाऊंगी।
मैंने उसकी गोरी पीठ पर हाथ फेरा और उसके ब्रा के हुक्स खोल दिए। सामने से ब्रा खींची तो दो संतरे उछालकर बाहर आ गए। मैंने धीरे से उन्हें सहलाया। मैंने दोनों हाथ उन पर रख दिए और उनको मसलने लगा।
कव्या तो जैसे मानो छटपटा रही थी, वह बोलने लगी- ओह गोड ! क्या कर रहे हो अज्जू ! और करो ! बहुत मज़ा आ रहा है !
अब मैंने बारी बारी से उसके संतरों को खूब चूसा। क्या मम्मे थे। एक को दबाता तो दूसरे को चूसता। गोरी चिट्टी कव्या मेरे ऊपर अधनंगी बैठी थी। एक सपना जैसा था। मैं मन ही मन बोला- देख विशु ! तेरी जिज्जी कैसे मेरे ऊपर नंगी बैठी है।
अब मैंने उसे खड़ा किया और धेरे से उसका पायजामा उतारा। क्या जांघें थीं। क्या टांगें थीं। बस देखते ही बनती थीं। कव्या की टांगों पर मैंने हाथ फेरना शुरू किया। दोनों हाथ मानो किसी चिकनी मिटटी पर फिर रहे हों। अब उसके और मेरे बीच में उसकी यह काली चड्डी थी।

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