घरवाली और पड़ोस वाली डबल मज़ा भाग 2

बंसल्स ठीक शाम 6:00 बजे पहुँच गए. सब ने एक दुसरे से परिचय किया. हर आदमी एक दुसरे को टाइट हग कर रहा था. तृषा वहां खड़े हो कर आश्चर्य से इन सब का मिलाप देख रही थी. कविता को जब गौरव ने हग किया तो वो इतना टाइट हग था की कविता उसका मोटा और लम्बा लंड अपने बदन पर गड़ता हुआ महसूस कर सकती थी. गौरव ने अपना हाथ कविता की गांड पर रखा और हलके से मसला. कविता ने घूम कर इधर उधर देखा – विवेक रेनू लगभग उसी हालत में थे. सायरा और तृषा पीछे के दरवाजे से निकल रहे थे. कविता ने गौरव से नज़रें मिलाईं और मुस्कराई और फुसफुसाई
“ध्यान से गौरव…जरा ध्यान से”
इस बात का मतलब था की मेरी गांड से खेलो जरूर पर तब जब कोई देख न रहा हो.

सब लोगों ने ड्राइंग रूम पार कर के पेटियो में प्रवेश किया. कविता ने वहां सैंडविच, समोसे, चाय वगैरह लगवा रखे थे. विवेक और कविता एक दुसरे के देख कर बीच बीच में मुस्करा लेते थे. विवेक ने ध्यान दिया की उनकी बेटी तृषा एक वहां अकेली लडकी थी जिसने ब्रा पहनी हुई थी.

सायरा हर बहाने से अपने शरीर की नुमाइश कर रही थी. उसे पता था की विवेक उसे देख देख के मजे ले रहा है.

गौरव की पत्नी रेनू काफी खुशनुमा स्वभाव की थी. तब वो झुक कर खाना अपनी प्लेट में डाल रही थी, उसके लो-कट ब्लाउज से उसके मम्मे दिखते थे. विवेक को यह देख कर बड़ा आनंद आ रहा था. वैसे रेनू और कविता दोनों की दिल्ली की लड़कियां थीं. शायद इसी लिए इस मामले में दोनों काफी खुले स्वभाव की थीं.

सब लोग नाश्ता खाते हुए एक दुसरे से बात कर रहे थे. सायरा और तृषा जल्दी से गायब हो गए. शायद वे दोनों तृषा के रूम में बैठ कर कुछ मूवी देख रहे थे. कविता गौरव को अन्दर ले कर गयी और उसे दिखाने लगी की उनका इम्पोर्टेड स्टोव कैसे काम करता है. रेनू विवेक को देख कर मुस्कुरा रही थी.

“सो ये मोहल्ला मजेदार है की नहीं विवेक. हम जब मुंबई से मूव हो रहे थे, तो वहां के पड़ोसियों को छोड़ने का बड़ा अफ़सोस था हमें. हम उनसे काफी करीब भी आ चुके थे”

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रेनू ने पूछा.

विवेक मुस्कराने हुए रेनू के मस्त उठे हुए मम्मे देख रहा था. उसने उसे देखा और जवाब दिया,
“मुझे लगता है आप लोगों के आने से मोहल्ले में नयी रौनक आ जायेगी.”

रेनू मुस्कराई और बोली,
“ये मुझे एक इनविटेशन जैसा लग रहा है विवेक. जब हम लोग थोडा सेटल हो जाएँ, तुम और कविता हमारे साथ एक शाम गुजारना.”

विवेक बोला,
“ओह उसमें तो बड़ा मज़ा आएगा. हम लोग आपके मुंबई के पड़ोसियों वाले खेल भी खेल सकते हैं उस दिन”

“रियली? क्या तुम और कविता वो वाले खेल खेलना चाहोगे?” रेनू ने चहकते हुए पूंछा.
रेनू मनो ये पूँछ रही हो, “अरे विवेक तो तुम्हें मालूम भी है की हम कौन सा खेल खेल खेलते हैं वहां?”

विवेक मन ही मन मुस्कराते हुए मना रहा था कि भगवान् करे तुम उसी खेल की बात कर रही हो जिसमें उसे रेनू की स्कर्ट के अन्दर जाने का मौका मिले.

वह आँख मारते हुए बोला

“रेनू, अगर तुम सिखाने को तैयार को वो खेल तो हम लोग सीखने में बड़े माहिर हैं”

ऐसी गर्म बातें सुनते ही विवेक का लंड न चाहते हुए भी थोडा टाइट हो गया. रेनू ने ये बात तुरंत नोटिस की. वो अपने होठों को होठों से चबाते हुए मुस्कराई और विवेक की तरफ थोडा झुक गयी. उसका बलाउज थोडा खुल सा गया और विवेक को उसकी गुलाबी और मस्त टाइट चून्चियों का मस्त नज़ारा दिख गया. उसने चून्चियों का अपनी आँखों से सराहते हुआ कहा,

“हमको लगता था की हमें दोस्ती करने में थोडा वक़्त लगेगा. पर तुम लोगों से मिल कर लगता है की मैं गलत था.”

विवेक और रेनू की नज़रें एक दुसरे से मिलीं. विवेक किसी भी लडकी से इतनी जल्दी नहीं घुला मिला था. दोनों को बहुत अच्छी तरह से पता था की उनके दिमाग में क्या खिचड़ी पाक रही थी. विवेक रेनू को जल्दी से जल्दी चोदना चाह रहा था. रेनू को ये बात बहुत साफ़ दिखाई पद रही थी. और सबसे बड़ी बात तो ये थी की विवेक को रेनू के स्कीम बड़ी अच्छे तरह से पता थी.

विवेक मुस्कराया और बोला,
“मैं हमारे खेल खेलने का बेसब्री से इंतज़ार कर रजा हूँ.”

“वो तो ठीक है मिस्टर विवेक, पर तुम्हारी बेगम कविता का क्या”
रेनू ने पूछा.
“मुझे लगता है की उसे भी ये खेल पसंद आएगा, हम दोनों ने कुछ करते हुए इस बारे में कई बारे में बात करी है” , विवेक बोला.

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“कुछ करते हुए ..हाँ.. पर क्या करते हुए?” रेनू ने उसे चिढाया.

“वही जो मैं तुम्हारे साथ करना चाह आहा हूँ.” विवेक ने अंततः बोल ही डाला. उसने ये मान लिया था की गौरव को इससे कोई समस्या नहीं है.

रेनू ने विवेक के खड़े लंड उसके शॉर्ट्स के अन्दर देखा और एक सिहरन भरते हुए बोला,
“अजीब सी बात है. अभी अभी खाया है पर फिर से कुछ खाने का दिल करने लगा”

विवेक हंसने लगा और बोला,
“मुझे भी. क्या हमने कुछ और खाने के लिए तुम लोगों के सेटल होने का इंतज़ार करना पड़ेगा?”

“किस बात के लिए विवेक” रेनू ने उसे फिर से चिढाते हुए पूछा.

विवेक को रेनू का ये चिढाने का अंदाज़ बड़ा भाया. वो बोला

“वही बात जिसमें मुझे तुम्हारे सारे ओपेनिंग्स भरने का मौका मिले.”
“ओह..बात तो ये है की मैं तो बिलकुल तैयार हूँ, अभी के अभी.. पर तुम कल सुबह हमारे यहाँ क्यों नहीं आ जाते…हम मिल कर अपने खेलों की प्रक्टिस जम कर करेंगे …”

“किस वक़्त””

“दस बजे? हमारा दरवाजा खुला छोड़ देंगे. बस आ जाना. और विवेक साहब…मुझे तुम्हारी ओपेनिंग्स भरने वाला खेल बहुत पसंद…बहुत…”

बाहर अँधेरा होने लगा था. वो दोनों वहां बैठ कर बात कर रहे थे. दोनों खड़े होते और उन्हें हाथ एक दूसरे के शरीर पर चल रहे थे मानों एक दुसरे में कुछ ढूंढ रहे हों. विवेक के हाथ रेनू की फिट गांड पर रेंग रहे थे, वो बीच बीच में उसके ब्लाउज में हाथ डाल कर उसके मम्मे मसल लेता. तो कभी पैंटी मन डाल कर उसकी चूत में उंगली डाल देता. रेनू विवेक के शॉर्ट्स में हाथ डाले बैठी थी और उसके खड़े लंड को अपने मुलायम हाथों से सहला रही थी. ये सोच कर की कल ये लंड उसकी चूत में होगा उसे एक अजीब सी सिहरन सी हो रही थी.

इसी बीच किसी के आने की आवाज ने उन्हें चौंका दिया और वो दोनों एक दम से अलग दूर हो कर खड़े हो गए थे मानों उनके बीच कुछ हुआ ही न हो.

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